चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३० ] सूत्रस्थानम् ३६३ तन्महत्ता महामूलास्तज्जौजः परिरक्षता । परिहार्या विशेषेण मनसो दुःखहेतवः ॥ १३ ॥ हृद्यं यत्स्याद्यदौजस्यं स्रोतसां यत्प्रसादनम् । तत्तत्सेव्यं प्रयत्नेन प्रशमो ज्ञानमेव च ॥ १४ ॥ हृदय स्थित मन की रक्षा में कारण छः अंगों वाले शरीर, बुद्धि आदि का हृदय स्थान है। ओजोवहा धमनियाँ भी इसी हृदय से निकलती हैं, यही हृदय इनका मूल है। इसलिये ओज की रक्षा करने के लिये मानसिक दुःखों के कारणों से विशेष रूप में बचना चाहिये। जो वस्तु हृदय और ओज के लिये हितकारी हो, एवं मनोवहा आदि स्रोतों को निर्मल करनेवाली हो और शान्ति तथा तत्त्वज्ञान को देने वाली हो, उसे प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिये ।१३-१४। अथ खल्वेकं प्राणवर्धनानामुत्कृष्टतममेकं बलवर्धनानामेकं बृंहणा- नामेकं नन्दनानामेकं हर्षणानामेकमयनानामिति । तत्राहिंसा प्राणिनां प्राणवर्धनानामुत्कृष्टतमं, वीर्यं बलवर्धनानां विद्या बृंहणानां, इन्द्रिय- जयो नन्दनानां, तत्त्वावबोधो हर्षणानां, ब्रह्मचर्यमयनानामित्यायुर्वेद- विदो मन्यन्ते ॥ १५ ॥ सेवन करने योग्य वस्तुएं कहते हैं—प्राणों को बढ़ाने के लिये सबसे उत्कृष्ट वस्तु एक ही है (दूसरा नहीं), बल को बढ़ाने में एक; वृष्य वस्तुओं में उत्कृष्टतम एक, श्रेय समृद्धिकारक हर्षोत्पादक में एक; मोक्षदायक में सबसे श्रेष्ठ वस्तु एक ही है। जैसे प्राणियों के प्राणों को बढ़ाने के लिये अहिंसा सबसे उत्कृष्ट है, बल वर्धकों में वीर्य, बृंहण वस्तुओं में विद्या, श्रेयस्कर वस्तुओं में इन्द्रियों का संयम, हर्षोत्पादक वस्तुओं में तत्त्वज्ञान और मोक्ष- दायक वस्तुओं में ब्रह्मचर्य ही सबसे श्रेष्ठ है, ऐसा आयुर्वेद विद्वान् मानते हैं ॥ १५ ॥ तत्राऽऽयुर्वेदविदस्तन्त्रस्थानाध्यायप्रश्नानां पृथक्त्वेन वाक्यशो वाक्यार्थशोऽर्थावयवशश्च प्रवक्तारो मन्तव्याः ॥ १६ ॥ अत्राऽऽह-कथं तन्त्रादीनि वाक्यशो वाक्यार्थशोऽर्थावयवशश्चेत्यु- क्तानि भवन्तीति। अत्रोच्यते—तन्त्रमार्षं कार्त्स्न्येन यथाऽऽम्नायमुच्य- मानं वाक्यशो भवत्युक्तम्। बुद्ध्या सम्यगनुप्रविश्यार्थतत्त्वं वाग्भि- र्व्यास-समास-प्रतिज्ञा-हेतूदाहरणोपनय-निगमन-युक्ताभिस्त्रिविध-शिष्य- बुद्धिगम्याभिरुच्यमानं वाक्यार्थशो भवत्युक्तम् । तन्त्रनियतानामर्थ- दुर्गाणां पुनर्विभावनेनोक्तमर्थावयवश्रो भवत्युक्तम् ॥ १७ ॥