भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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३९२ चरकसंहिता [ अ० ३० जाती है और हृदय के विदीर्ण होने से मनुष्य मर जाता है । हृदय के नाश होने से हृदय में आश्रित संसारी आत्मा भी नष्ट हो जाता है । स्पर्श को जो जानता है या जिसके कारण स्पर्श ज्ञान होता है वही 'धारी' शरीर इन्द्रिय, सत्त्व और आत्मा के संयोग ( शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो धारि जीवितम् ) ये सब हृदय में आश्रित हैं। यह हृदय परम ( श्रेष्ठ ) ओज का स्थान है, चैतन्य विषयों में फैले हुए मन का इसी हृदय में संग्रह होता है। विषयों में गये हुए इसी मनको हृदय में रोकने से योगी बनते हैं और योग मोक्ष का साधन (योगो मोक्षप्रवर्तकः) है। इसलिये हृदय को महत् और इन शब्दों से चिकित्सक कहते हैं ॥ ४-७ ॥ तेन मूलेन महता महामूला मता दश । ओजोवहाः शरीरेऽस्मिन् विध्यम्यन्ते समन्ततः ॥ ८ ॥ येनौजसा वर्तयन्ति प्रीणिताः सर्वजन्तवः । यहते सर्वभूतानां जीवितं नावतिष्ठते ॥ ९ ॥ यत्सारमादौ गर्भस्य यत्तद्गर्भरसादसः । संवर्तमानं हृदयं समाविशति यत्पुरा ॥ १० ॥ यस्य नाशात्तु नाशोऽस्ति धारि यद्धृदयाश्रितम् । यः शरीररसस्नेहः प्राणा यत्र प्रतिष्ठिताः ॥ ११ ॥ तत्फला बहुधा वा ताः फलन्तीव महाफलाः । धमानाद्धमन्यः स्रवणात् स्रोतांसि सरणात्सिराः ॥ १२ ॥ इस हृदय से महामूल वाली ( जिनका प्रभावस्थान बड़ा है, ऐसी ) दस ओजवाहिनी धमनियां निकल कर इस सम्पूर्ण शरीर में फैलती हैं । जिस ओज के पुष्ट होने पर सब प्राणी जीते हैं, जिस ओज के बिना प्राणियों का जीवन नहीं रह सकता, जो ओज शुक्र रक्त संयोग से बने गर्भ में सारभूत है, और जो शुक्र रक्त के संयोग से बने कलल रूप में रसरूप सार है, जो ओज हृदय के बनने पर स्पष्ट होकर हृदय में रहता है, जिस ओज के नष्ट होने पर ( धातुओं का क्षय न होने पर भी ) मृत्यु निश्चित है, जो कि प्राणों को धारण करने में मुख्य है, जिस ओज में प्राण आश्रित हैं उस ओज को लेजाने वाली, ओजोवहा, महाफला दस धमनियां हृदय का आश्रय लेकर अनेक प्रकार से फलती हैं । वे हृदय में दस होती हुई भी शरीर में प्रतान भेदों से असंख्य बनजाती हैं । पूरण अर्थात् बाह्य रस द्वारा भरने से ( स्पन्दन होने से ), धमनियाँ, स्रवण अर्थात् रस, पोष्य वस्तु का स्रवण होने से स्रोतस् और दूसरे देश या स्थान में जाने से 'सिरा' कहलाती हैं ॥ ८-१२ ॥