चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३० ] सूत्रस्थानम् ३६५ ( नित्य ) है या अशाश्वत ( अनित्य ) ? इस आयुर्वेद के कितने और कौन २ से अंग हैं ? आयुर्वेद किन को पढ़ना चाहिये ? और इस आयुर्वेद का प्रयो- जन क्या है ? वैद्य से इस प्रकार प्रश्न पूछे जाने पर वैद्य को ऋग्, यजुः, साम और अथर्व इन चारों वेदों में से अथर्व वेद में ही अपनी भक्ति ( श्रद्धा ) बतलानी चाहिये । क्योंकि अथर्ववेद ने स्वस्ति-अयन, बलि, मंगल, होम, नियम, प्रायश्चित्त, वा उपवासादि द्वारा रोग की चिकित्सा कही है । चिकित्सा आयु की मंगल कामना से कही जाती है, आयुर्वेद यह अथर्ववेद का एक भाग है । वेद सम्बन्धी विवेचन करने के पीछे ही आयुसम्बन्धी विवेचन किया जाता है । चैतन्यपरम्परा, जीवित, अनुबन्धन, धारि ये आयु-शब्द के समानार्थवाची हैं । आयुर्वेद किस लिये कहते हैं इसका उत्तर अपने लक्षण से, सुख-दुःख हित- कारी अहितकारी, प्रमाण अप्रमाण एवं आयुवर्धक और आयुक्षयकारक द्रव्यों के गुण कर्म सम्पूर्ण रूपमें कहे जाते हैं, इसलिये, इस शास्त्र को आयुर्वेद कहते हैं ॥ १८-२२ ॥ तत्राऽऽयुरुक्तं स्वलक्षणतो यथावदिहैव । तत्र शरीरमानसाभ्यां रोगाभ्यामनभिद्रुतस्यानभिभूतस्य च विशेषेण यौवनवतः समर्थानु- गत-बल-वीर्य-यशः-पौरुष-पराक्रमस्य ज्ञान-विज्ञानेन्द्रियेन्द्रियार्थ-बल- समुदाये वर्तमानस्य परमर्द्धि-रुचिर-विविधोपभोगस्य समृद्धसर्व्वारम्भस्य यथेष्टविचारिणः सुखमायुरुच्यते, असुखमतो विपर्ययेण । हितैषिणः पुनर्भूतानां परस्वादुपरस्य सत्यवादिनः शमपरस्य परीक्ष्यकारिणोऽ- प्रमत्तस्य त्रिवर्गं परस्परेणानुपहतमुपसेवमानस्य पूजार्हसंपूजकस्य ज्ञान-विज्ञानोपशम-शीलस्य वृद्धोपसेविनः सुनियत-राग रोषेर्ष्या-मद- मान-वेगस्य सततं विविधप्रदानपरस्य तपो-ज्ञान-प्रशम-नित्यस्याध्यात्म- विदस्तत्परस्य लोकमिमं चामुं चापेक्षमाणस्य स्मृतिमतो हितमायुरु- च्यते । अहितमतो विपर्ययेण ॥ २३ ॥ आयु का लक्षण ( चेतनानुवृत्ति चेतनपरम्परा ० ) इस स्थान पर कह दिया है । जिस मनुष्य को शारीरिक या मानसिक किसी प्रकार का रोग नहीं, शरीर में तारुण्य भरा है, शरीर में शक्ति, बल, वीर्य और पौरुष, पराक्रम है, ज्ञान, बुद्धि, इन्द्रिय और विषय बलवान् हैं, सम्पत्ति, प्रिय और नाना प्रकार के भोग्य पदार्थ अनुकूल हों, सब कार्यों में जिसको सफलता मिलती हो, स्वेच्छापूर्वक आहार-विहार करने योग्य जो मनुष्य हो, उसकी आयु सुखमय समझनी चाहिये । इसके विरुद्ध दुःखमय समझना । जो मनुष्य सब प्राणियों का कल्याण चाहता