चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 415, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ३० ] सूत्रस्थानम् ३६७ स्वलक्षणं च द्रव्याणां पृथिव्यादीनां । सन्ति तु सर्वदा गुणाश्च नित्या- नित्याः। न ह्यायुर्वेदस्याभूत्वोत्पत्तिरुपलभ्यते, अन्यत्रावबोधोपदे- शाभ्याम् । एतद्द्वयमधिकृत्योत्पत्तिमुपदिशन्त्येके। स्वाभाविकं चास्य लक्षणमकृतकं, यदुक्तमिह चाऽऽष्टेऽध्याये-यथाऽग्नेरौष्ण्यमपां द्रवत्वम्। भावस्वभावनित्यत्वमपि चास्य यथोक्तं गुरुभिरभ्यस्यमानैर्गुरूणा- मुपचयो भवत्यपचयो लघूनामित्येवमादि ॥ २६ ॥ यह आयुर्वेद नित्य है, ऐसा माना जाता है। उसके तीन हेतु हैं, १. अनादि होने से, २. स्वभाव सिद्ध होने से, ३. पदार्थों के गुण, धर्म नित्य होने से। इसका विस्तार से वर्णन करते हैं। आयुर्वेद में आयुष्य का प्रतिपादन किया है और सर्वदा ही आयु की परम्परा सन्तान-न्याय से चली आ रही है (बिना आयु के कोई नहीं हुआ)। इसी प्रकार बुद्धि की परम्परा भी अनादि काल से चली आ रही है। (एक मरता है, दूसरा जीवित रहता है इस प्रकार से आयु की परम्परा चलीआरही है) इसलिये आयुष्यादि प्रतिपाद्य विषय अनादि है। इसको प्रतिपादन करने वाला आयुर्वेद भी अनादि है। आयुर्वेद उपकरण और आयुष्य उपकार्य है। विना उपकरण के कार्य नहीं रह सकता। इसी प्रकार बुद्धि के भी अनादि होने से आयुर्वेद का ज्ञान भी अनादि है और इस ज्ञान को जानने वाले भी अनादि हैं। दूसरा आरोग्यता या रोग को उत्पन्न करने वाले, अथवा रोग के लक्षण, कारण, चिकित्सा आयुर्वेद में प्रतिपादन किये हैं और वे अनादि है। क्योंकि सुख-दुःख अनादि काल से चला आ रहा है, इसलिये इनको प्राप्त तथा नाश करने के भी उपाय अनादि होने चाहिये। तीसरी गुरु, हलका, ठण्ठा, गरम, स्निग्ध, रूक्ष पदार्थों के ये गुण धर्म भी नित्य हैं, इसलिये इन गुण धर्मों को बताने वाला आयुर्वेद भी नित्य है। पृथि- व्यादि पंच महाभूतों के गुण धर्म नित्य हैं, परन्तु इनसे बने पदार्थ अनित्य हैं। इसी प्रकार मिट्टी नित्य और मिट्टी से बना घड़ा अनित्य है। इस प्रकार से मनुष्य-शरीर को बनाने वाले परिणाम नित्य हैं। और इस परिणाम रूप निर्माण क्रिया को बतलाने वाला आयुर्वेद भी नित्य है। आयुर्वेद का एक समय अस्तित्व नहीं था, उत्पन्न हुआ है ऐसा कहीं पर सुनने में नहीं आता। जहां पर भी आयुर्वेद का प्रादुर्भाव लिखा है, वहां पर इसका अबोध या उपदेश रूप से प्रतिपादन किया है कि इन्द्र के उपदेश से भरद्वाज मुनि मृत्यु लोक में आयुर्वेद को लाये, यह उपदेश और ब्रह्मा के अन्दर जो ज्ञान का उदय हुआ वही इसकी उत्पत्ति है। आयुर्वेद स्वाभाविक एवं अकृतक है। जैसा कि