चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ३० ] २६ सूत्रस्थानम् ४०१ अध्याय के तीन अरिष्ट (इन्द्रिय), कल्प और सिद्धि स्थान, आठ-२ अध्याय के निदान, विमान और शारीर ये तीन स्थान हैं। श्लोक, औषध, अरिष्ट, विकल्प, सिद्धि, निदान, विमान और आश्रय नामक १२० अध्यायों में ग्रन्थ समाप्त हुआ है। अपने २ स्थान में यथायोग्य स्थानों का उपदेश तत्त्वार्थ सहित कहेंगे। इन १२० अध्यायों के क्रम से नाम सुनो— दीर्घञ्जीवितीय, अपामार्गतण्डुलीय, आरग्वधीय, षड्विरेचनशताश्रितीय, इन चार अध्यायों में 'औषध-चतुष्क' का निरूपण किया है। मात्राशितीय, तस्या- शितीय, नवेगानधारणीय और इन्द्रियोपक्रमणीय ये चार स्वास्थ्य-चतुष्क हैं। खुड्डाकचतुष्पाद, महाचतुष्पाद, तिस्त्रैषणीय और वातकलाकलीय ये चार निर्देश चतुष्क (कर्त्तव्य अकर्त्तव्य विषयक) हैं। स्नेहन, स्वेदन, उपकल्पनीय और चिकित्सा प्राभृतीय ये चार कल्पनाचतुष्क हैं। कियन्तःशिरसीय, त्रिशोथीय, अष्टोदरीय, महारोगाध्याय—ये चार रोगचतुष्क हैं। अष्टौनिन्दितीय लंघन-बृंहणीय सन्तर्पणीय और विधिशोणितीय ये चार योजनाचतुष्क हैं। यज्जःपुरुषीय, आत्रे- यभद्रकाप्यीय, अन्नपानीय, विविधाशितपीतीय ये चार अन्नपान-चतुष्क हैं। दश प्राणायतनीय और अर्थे-दशमहामूलीय इन पिछले दोनों अध्यायों में प्राण, ओज, धमनी और वैद्यों के गुणों का निरूपण किया है। इस प्रकार से इस सूत्रस्थान में औषध-चतुष्क, स्वास्थ्य-चतुष्क; निर्देश-चतुष्क, कल्पना-चतुष्क; रोग-चतुष्क; योजना-चतुष्क, अन्नपान-चतुष्क तथा पहले दो अध्यायों में इन अठाईस अध्यायों की सूची है। इस प्रकार से सूत्रस्थान के तीस अध्यायों में इन विषयों का वर्णन किया है। जिस प्रकार मनुष्य के सब अंगों में श्रेष्ठ मस्तिष्क है उसी प्रकार से सब ग्रन्थों में यह श्रेष्ठ है। इस सूत्र स्थान में उप- योगी चतुष्कों का संग्रह किया है। श्लोक रूप में संग्रह होने के कारण इसको 'श्लोकस्थान' कहते हैं ॥ ३३-४५ ॥ ज्वराणां रक्तपित्तस्य गुल्मानां मेहकुष्ठयोः । शोषोन्मादनिदाने च स्यादपस्मारिणां च यत् ॥ ४६ ॥ इत्यध्यायाष्टकमिदं निदानस्थानमुच्यते । ज्वर निदान, रक्तपित्त निदान, गुल्म निदान, प्रमेह निदान, कुष्ठ निदान, शोष निदान, उन्माद निदान और अपस्मार निदान—ये आठ अध्याय निदान- स्थान में हैं ॥ ४६ ॥ रसेषु त्रिविधे कुक्षौ ध्वंसे जनपदस्य च ॥ ४७ ॥ त्रिविधे रोगविज्ञाने स्रोतःस्वपि च वर्तने ।