चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 421, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विव्रणीयं त्रिमर्मीयमूरुस्तम्भिकमेव च । वातरोगे वातरक्ते योनिव्यापदि चैव यत् ॥ ६० ॥ त्रिंशच्चिकित्सितान्युक्त्वाऽन्यतः कल्पाम् परं शृणु । अभयामलकीय, प्राणकामीय, करप्रचितीय, आयुर्वेदसमुत्थानीय, संयोग- शरमूलीय, आसिक्तक्षीरीय, माषपर्ण, पुमाञ्जातबलादिक इन भिन्न २ आठ प्रकरणों के दो अध्याय हैं । इनमें पहिले चार प्रकरणों में रसायनाध्याय और दूसरे चार में वाजीकरणाध्याय कहा है । इसके पीछे ज्वरचिकित्सा, रक्तपित्त- चिकित्सा, गुल्म-चिकित्सा, प्रमेह-चिकित्सा कुष्ठ, शोष, उन्माद, अपस्मार, उरःक्षत, शोफ, उदर, अर्श, ग्रहणी, पाण्डुरोग, श्वास, कास, अतीसार, छर्दि, वीसर्प, तृष्णा, विषरोग, मद्यरोग, द्विव्रणीय, त्रिमर्मीय, ऊरुस्तम्भ, वातव्याधि, वात- रक्त इस प्रकार से कुल मिलाकर चिकित्सा स्थान में तीस अध्याय हैं ॥५५-६०॥ फलजीमूतकेक्ष्वाकु-कल्पो धामार्गवस्य च ॥ ६१ ॥ पञ्चमो वत्सकस्योक्तः षष्ठश्च कृतवेधने । श्यामात्रिवृतयोः कल्पस्तथैव चतुरङ्गुले ॥ ६२ ॥ तिल्वकस्य सुधायाश्च सप्तलाशङ्खिनीषु च । दन्तीद्रवन्त्योः कल्पश्च द्वादशोऽयं समाप्यते ॥ ६३ ॥ मदनफलकल्प जीमूतककल्प, ईक्ष्वाकुकल्प, धामार्गवकल्प, वत्सक- कल्प, कृतवेधनकल्प, श्यामात्रिवृत्कल्प, महावृक्षकल्प, सप्तलाशंखिनीकल्प, और दन्ती-द्रवन्तीकल्प ये बारह अध्याय कल्पस्थान में हैं ॥ ६१-६३ ॥ कल्पना पञ्चकर्माख्या बस्तिमूत्रा तथैव च । स्नेहव्यापदिकी सिद्धिर्नेत्रव्यापदिकी तथा ॥ ६४ ॥ सिद्धिः शोधनयोश्चैव बस्तिसिद्धिस्तथैव च । प्रासृती मर्मसंख्याता सिद्धिर्बस्त्याश्रया च या ॥ ६५ ॥ फलमात्रा तथा सिद्धिः सिद्धिश्चोत्तरसंज्ञिता । सिद्धयो द्वादशैवैतास्तन्त्रं चासु समाप्यते ॥ ६६ ॥ सिद्धिस्थान, कल्पसिद्धि, पंचकर्मीय सिद्धि, बस्तिसूत्रीय सिद्धि, स्नेहव्याप- दिक सिद्धि, नेत्रव्यापदिक सिद्धि, वमनविरेचन-व्यापत्सिद्धि, बस्तिव्यापदिक सिद्धि, प्रसृतयोगिकसिद्धि, त्रिमर्मीय सिद्धि, बस्ति सिद्धि, फलमात्र सिद्धि, और उत्तर सिद्धि—ये बारह अध्याय सिद्धि स्थान में हैं। इस प्रकार से यह ग्रन्थ समाप्त होता है ॥ ६४-६६ ॥ स्वे स्वे स्थाने तथाऽध्याये चाध्यायार्थः प्रवक्ष्यते । तं ब्रूयात्सर्वतः सर्वं यथास्वं ह्यर्थसंग्रहात् ॥ ६७ ॥