भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 432, कुल 639 में से

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४१४ चरकसंहिता [ अ० १ अवपीडन अर्थात् दबाने के समान और सूइयां चुभने के समान वेदनायें होती हैं। हनुग्रह (जबड़े का न खुलना), कानों में आवाज़ (कर्णनाद) कान एवं शंख प्रदेश (कनपटी) में वेदना, मुख का कषाय स्वाद, मुख में विरसता, मुख, तालु, कण्ठ का पुन: २ सूखना; प्यास का अधिक लगना, दिल या छाती का जकड़ना, रुक जाना, सूखी उबकाई, वमन होने पर वमन में किसी पदार्थ का बाहर न निकलना, सूखी खांसी, छींक और डकार का बन्द हो जाना; सब अवसरों में अनिच्छा (अथवा अन्न रस का वमन); मुख से पानी का बहना; अरुचि, भोजन की अनिच्छा, अविपाक (भोजन का न पचना), विषाद, जम्भाईयां आना, अंगों का मुड़ना-तुड़ना, अंगड़ाईं आना, कम्पन, प्रलाप, जागरण (नींद का न आना), रोमों का भर-भरा आना (दान्तों का स्तम्भ हो जाना) गरम वस्तुओं को चाह; एवं वातज्वर के निदा- नभूत वस्तुओं का सेवन अनुकूल न आना तथा निदान (रूक्ष लघु, शीतादि गुणों) के विपरीत गुणों वाले पदार्थों को अनुकूल आना ये सब वातज्वर के लक्षण हैं ॥ १० ॥ उष्णाम्ल-लवण-क्षार-कटुकाजीर्ण-भोजनेभ्योऽतिसेवितेभ्यस्तथाऽति- तीक्ष्णातपाग्नि-सन्ताप-श्रम-क्रोध-विषमाहारेभ्यश्च पित्तं प्रकोपमापद्यते । पित्त प्रकोप के कारण—उष्ण, खट्टा, नमकीन, क्षार, कटु और अजीर्ण- कारक पदार्थों के अतिसेवन से; तथा अतितीक्ष्ण, बहुत धूप, अग्निसन्ताप, श्रम, क्रोध, विषम भोजन के सेवन से पित्त प्रकुपित होता है । तद्यदा प्रकुपितमामाशयादूष्माणमुपसृज्याऽऽद्यमाहारपरिणामधातुं रसनामानमन्ववेत्य रसस्वेदवहानि स्रोतांसि पिधाय द्रवत्वादग्निमुप- हत्य पक्तिस्थानादूष्माणं बहिर्निरस्य प्रपीडयत्केवलं शरीरमनुप्रपद्यते तदा ज्वरमभिनिर्वर्तयति; तस्येमानि लिङ्गानि भवन्ति । पित्तज्वर की सम्प्राप्ति-यह प्रकुपित हुवा पित्त आमाशय में स्थित उष्णिमा से मिलकर, अन्न के पाचन से उत्पन्न प्रसाद नामक रस से मिलकर रसवह और स्वेदवह स्रोतों को बन्द कर देता है और पित्त द्रव होने से अग्निको मन्द करता है, इसलिये पक्वाशय से उष्णिमा को बाहर निकाल देता है, तब पित्त सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर शरीर को पीड़ित करता है। इस प्रकार से ज्वर को उत्पन्न करता है। पित्त ज्वर के लक्षण ये होते हैं ॥ तद्यथा-युगपदेव केवले शरीरे ज्वरस्याभ्यागमनमभिवृद्धिश्च भुक्तस्य विदाहकाले मध्यन्दिनेऽर्धरात्रे शरदि वा बिशेषेण, कटुकास्यता

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