भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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४४६ चरकसंहिता [ अ० ४ मुख में मिठास, हाथ-पांव में शून्यता और जलन, मुख, तालु और कण्ठ में शुष्कता, प्यास का लगना, आलस्य, कार्य करने में अनिच्छा, शरीर में मल का जमना, शरीर के रोम-छिद्रों का बन्द हो जाना, अंगों में जलन एवं शून्यता, शरीर या मूत्र पर भौंरों या चिउंटी का चढ़ना, मूत्र में मूत्र के दोष शरीर से दुर्गन्ध आना, तथा हर समय आंखों में नींद या तन्द्रा ( भारीपन ) रहता है ॥ ४१ ॥ उपद्रवास्तु खलु प्रमेहिणां—तृष्णातीसार-ज्वर-दाह-दौर्बल्यारोच- काविपाकाः पूति-मांस-पिडकाऽलजी-विद्रध्यादयश्च तत्प्रसंगाद्भवन्ति॥४२॥ तत्र साध्यान् प्रमेहान् संशोधनोपशमनैर्यथार्हमुपपाद्यैश्चि- कित्सेदिति ॥ ४३ ॥ प्रमेह के उपद्रव—प्रमेह के रोगियों में ये उपद्रव उत्पन्न होते हैं । यथा- तृष्णा, प्यास, अतिसार, ज्वर, दाह, दुर्बलता, अरुचि, अविपाक, अपचन, मांस में दुर्गन्धयुक्त पिड़कायें, अलजी, विद्रधि आदि ये सब उपद्रव प्रमेह के कारण होते हैं । चिकित्सा—इन सब प्रमेहो में जो प्रमेह साध्य हों, उनकी यथायोग्य रीति से संशोधन या सशमनविधि से चिकित्सा करनी चाहिये ॥ ४२-४३ ॥ भवन्ति चात्र—गृद्धमभ्यवहार्येषु स्नानचङ्क्रमणद्विषम् । प्रमेहः क्षिप्रमभ्येति नीडद्रुममिवाण्डजः ॥ ४४ ॥ मन्दोत्साहमतिस्थूलमतिस्निग्धं महाशनम् । मृत्युः प्रमेहरूपेण क्षिप्रमादाय गच्छति ॥ ४५ ॥ यस्त्वाहारं शरीरस्य धातुसाम्यकरं नरः । सेवते विविधांश्चान्याश्चेष्टाः स सुखमश्नुते ॥ ४६ ॥ प्रमेह किसको होता है—घोंसले की ओर जिस प्रकार पक्षी जल्दी पहुंच जाता है, उसी प्रकार खाने-पीने के लालची, स्नान एवं चलने-फिरने से द्वेष करने वाले पुरुष को प्रमेह बहुत शीघ्र लग जाता है । मन्द उत्साहवाले निरुत्साही, अतिस्थूल, अत्यन्त स्निग्ध शरीर वाले एवं बहुत खाने वाले पुरुष को मृत्यु प्रमेह रूप लेकर चली आती है । जो मनुष्य शरीर के धातुओं को समान करने वाले आहार तथा अन्य प्रकार की चेष्टाओं ( विहार ) का सेवन करता है, वह सुख भोगता है ॥ ४४-४६ ॥ तत्र श्लोकाः—हेतुर्व्याधिविशेषाणां प्रमेहाणां च कारणम् । दोषधातुसमायोगो रूपं विविधमेव च ॥ ४७ ॥