भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 463

अ० ४ ] निदानस्थानम् ४४५ वसासमिश्रं वसाभं च मुहुर्मेहति यो नरः । वसामेहिनमाहुस्तमसाध्यं वातकोषतः ॥ ३५ ॥ मज्जानं सह मूत्रेण मुहुर्मेहति यो नरः मज्जमेहिनमाहुस्तमसाध्यं वातकोपत‌ः ॥ ३६ ॥ हस्ती मत्त इवाजस्रं मूत्रं क्षरति यो भृशम् । हस्तिमेहिनमाहुस्तमसाध्यं वातकोपत‌ः ॥ ३७ ॥ कषायमधुरं पाण्डुं रूक्षं मेहति यो नरः । वातकोपादसाध्यं तं प्रतीयान्मधुमेहिनम् ॥ ३८ ॥ इत्येते चत्वारः प्रमेहा वातप्रकोपनिमित्ता व्याख्याता भवन्ति ॥ ३९ ॥ (१) वसामेह—जो मनुष्य वात के प्रकोप के कारण वसामिश्रित या वसा के समान रंगवाला मूत्र बार-बार करता है, उसको वसामेह का रोगी जानना चाहिये, यह रोग असाध्य है। (२) मज्जमेह—जो मनुष्य वायु के प्रकोप से मजा से युक्त मूत्र बारबार त्याग करता हो, उसको मज्जमेह का रोगी जानना चाहिये । यह भी रोग असाध्य है। (३) हस्तिमेह—जो मनुष्य वायु के प्रकोप से मस्त हाथी की भांति एक समान मूत्र, निरन्तर और बहुत अधिक करता है, उसको हस्तिमेह का रोगी कहते हैं, यह भी असाध्य है। (४) मधुमेह—जो मनुष्य वायु के प्रकोप से कषाय, मधुर, पाण्डुवर्ण और रूक्ष मूत्र त्याग करता है उसको मधुमेह का रोगी जानना चाहिये। यह भी असाध्य है। ये चार प्रमेह वायु के प्रकोप के कारण होते हैं ॥ ३५-३९ ॥ त एवं त्रिदोषप्रकोपनिमित्ता विंशतिः प्र ॓हा व्याख्याता भवन्ति ४० इस प्रकार से तीनो दोषो से उत्पन्न होने वाले सम्पूर्ण बीस प्रकार के प्रमेहो का वर्णन कर दिया है ॥ ४० ॥ त्रयस्तु दोषाः प्रकुपिताः प्रमेहानभिनिर्वर्तयिष्यन्त इमानि पूर्व- रूपाणि दर्शयन्ति । तद्यथा—जटिलीभावं केशेषु, माधुर्यमास्ये, करपा- दयोः सुप्ततादाहौ, मुखतालुकण्ठशोषं, पिपासां, आलस्यं, मलं च काये, कायच्छिद्रेषूपदेहं, परिदाहं, सुप्ततां चाङ्गेषु, षट्पद-पिपीलिकाभिश्च शरीरमूत्राभिसरणं, मूत्रे च मूत्रदोषान्, विस्रं शरीरगन्धं, तन्द्रां च ॓र्छादमिति ॥ ४१ ॥ । का पूर्वरूप—तीनों दोष कुपित होकर प्रमेह रोग को उत्पन्न करते समय ये पूर्वरूप दिखाई देते हैं। यथा—बालों का उलझ जाना,