चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४४ चरकसंहिता [ अ० ४ शेषा भवन्ति । तद्यथा—वसामेहश्च, मज्जमेहश्च, हस्तिमेहश्च, मधुमे- हश्चेति ॥ ३४ ॥ वातजमेह के कारण—रूक्ष, कटु, कषाय, तिक्त, लघु,शीत पदार्थों के उप- योग से स्त्रीसंग, व्यायाम, वमन, विरेचन, बस्तिकर्म और शिरोविरेचन इनके अतियोग से, वेगों को रोकना, अनशन ( उपवास ), चोट लगने से, धूप, शोक, उद्वेग, रक्त के अधिक निकलनेसे, जागने मे, शरीर को विषम अवस्था में रखने से, वातप्रकृतिवाले पुरुष में वायु तत्काल प्रकुपित हो जाता है । ( १ ) वसाप्रमेह की सम्प्राप्ति—इन कारणों से कुपित वायु, वात प्रकृति वाले मनुष्य के शरीर में फैलता हुआ जब वसा के साथ मिलकर मूत्रवह स्रोतों- में पहुंच जाता है, तब वसामेह को उत्पन्न करता है । ( २ ) मजमेह—और जब वायु मज्जा को मूत्रबस्ति में खींचकर ले जाताहै उस समय 'मज्जमेह' उत्पन्न होता है । ( ३ ) हस्तिमेह—जिस समय वायु लसीका १ से मिल कर मूत्राशय में जाकर मूत्र रूप से बाहर निकलता है, उस समय लसीका की अधिकता एवं वायु की विक्षेपण शक्ति के कारण मूत्र बहुत अधिक मात्रा में आता है । तब पुरुष मस्त हाथी के समान निरन्तर वेग से रहित मूत्र बहाया करता है, इसको 'हस्तिमेह' कहते हैं । ( ४ ) मधुमेह—शरीर में स्थित ओज का स्वभाव मधुर है । इस के साथ वायु का रूक्ष एवं कषाय गुण ( वायु अपनी शक्ति से ओज को कषाय में बदल देता है ) मिलकर जब मूत्राशय में जाता है, तब 'मधुमेह' रोग उत्पन्न होता है । सब वातजमेह असाध्य—वैद्य लोग इन चार वातजन्य प्रमेहों को असाध्य मानते हैं। क्योंकि मज्जा आदि सार रूप धातुओं का क्षय हो जाता है और चिकित्सा विपरीत पड़ती है, क्योंकि वायु के लिये स्निग्ध आदि पदार्थ पथ्य हैं, यही मेद के लिये अपथ्य और जो रूक्ष आदि मेद के लिये पथ्य हैं वह वायु के लिये अपथ्य हैं । इनके भी नाम पूर्व की भाँति गुणविशेष को लेकर हैं । यथा—१. वसामेह, २. मज्जमेह, ३. हस्तिमेह और ४. मधुमेह ॥ ३१-३४ ॥ तत्र श्लोका वातप्रमेहविशेषविज्ञानार्था भवन्ति— वातप्रमेहों को विशेष रूप से कहने के लिये ये निम्नलिखित श्लोक हैं— १ लसीका का अर्थ मांस की त्वचा के अन्दर रहने वाले जलीय भाग जैसा कहेंगे—'षण्मांसत्वगन्तरे उदकं तल्लसीकाशब्दं लभते ।'