चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४६० चरकसंहिता [ अ० ६
षोपजनयति, पित्तं पुनर्ज्वरमतीसारमन्तर्दाहं च, श्लेष्मा तु प्रति- श्यायं शिरसो गुरुत्वं कासमरोचकं च । स कासप्रसंगादुरसि क्षते शोणितं ष्ठीवति, शोणितगमनाच्चास्य दौर्बल्यमुपजायते । एवमेते विषमाशनोपचिता दोषा राजयक्ष्माणमभिनिर्वर्तयन्ति । तैरुपशो- षणैरुपद्रवैरुपद्रुतः शनैः शनैरुपशुष्यति । तस्मात्पुरुषो मतिमान् प्र- कृति-करण-संयोग-राशि-देश-कालोपयोग-संस्थोपशयादविषममाहारमा- हरेदिति ॥ ११ ॥ भवति चात्र—हिताशी स्यान्मिताशी स्यात्कालभोजी जितेन्द्रियः । पश्यन् रोगान् बहून्कष्टान्बुद्धिमान्विषमाशनात् ॥ १२ ॥ इति । ( ४ ) विषमाशन—विषमाशन शोष रोग का कारण है, यह जो कहा है अब उस की व्याख्या करेंगे— जब मनुष्य प्रकृति, करण, संयोग, राशि, देश, काल, उपयोग, संस्था तथा उपशय के विरुद्ध, पान-अशन, भक्ष्य और लेह्य रूप में अन्न-पान का उपयोग करता है, तब उस के वात, पित्त और कफ विषम हो जाते हैं । ये विकृत दोष जिस समय शरीर में फैलकर स्रोतसों वा नाड़ियों के मुखों को घेर लेते हैं तब मनुष्य जो भी भोजन खाता है उस का अधिक भाग मूत्र और मल में बदलकर इन को ही अधिक बढ़ाता है, इस प्रकार शरीर के अन्य धातु नहीं बढ़ते । पुरुष मल के रुकने से ही जीवन धारण किया करता है । इसलिये शुष्क होते हुए पुरुष के मल की रक्षा विशेष रूप से करनी चाहिये । इस प्रकार कृश होते हुए मनुष्य के विषम भोजन से बढ़े हुए दोष नाना उपद्रवों से युक्त होकर और भी शरीर को सुखा देते हैं; तब कुपित हुआ वातशूल, अंगों का टूटना, कण्ठभेद, पाश्र्वों में पीड़ा, कन्धों का टूटना, स्वरभेद और प्रतिश्याय उत्पन्न करता है । पित्तज्वर, अतिसार और अन्तर्दाह को उत्पन्न करता है । श्लेष्मा—प्रतिश्याय, शिर का भारीपन, कास और अरुचि उत्पन्न करता है । कास के कारण छाती में व्रण होने से थूक में रक्त आता है । रक्त के निकलने से कमज़ोरी आ जाती है । इस प्रकार से विषम भोजन द्वारा एकत्रित हुए दोष राजयक्ष्मा रोग को उत्पन्न करते हैं। शोषण करने वाले इन उपद्रवों से पीड़ित होने पर धीरे धीरे मनुष्य सूखने लगता है । इसलिये बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि प्रकृति, करण, संयोग, राशि, देश, काल, उपयोग, संस्था और उपशय के अनुकूल खान पान करे१ ।
१. इस का विस्तार 'रस-विमान' नामक अध्याय में कहेंगे ।