भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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४८२ चरकसंहिता [ अ० १ तत्राऽऽदौ रस-द्रव्य-दोष-विकार-प्रभावाम् वक्ष्यामः ॥ ४ ॥ इन में सब से प्रथम मधुर आदि रस, भेषज द्रव्य, वात आदि दोष और विकार और इन के प्रभावों को कहेंगे ॥ ४ ॥ रसास्तावत् षट् मधुराम्ल-लवण-कटु-तिक्त-कषायाः । ते सम्यगुपयुज्य- मानाः शरीरं यापयन्ति, मिथ्योपयुज्यमानास्तु खलु दोषप्रकोपायो- पकल्पयन्ति ॥ ५ ॥ रस छः हैं, मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय। इन का यदि भली प्रकार उपयोग किया जाय तो ये शरीर को स्वस्थ अवस्था में रखते हैं और यदि अन्यथा अर्थात् अन्यथा रूप में सेवन किये जावे तो वातादि दोषों को प्रकुपित करके रोगों को उत्पन्न करते हैं ॥ ५ ॥ दोषाः पुनस्त्रयो वात-पित्त-श्लेष्माणः । ते प्रकृतिभूताः शरीरोपकारका भवन्ति, विकृतिमापन्नास्तु खलु नानाविधैर्विकारैः शरीरमुपता- पयन्ति ॥ ६ ॥ दोष तीन हैं। वात, पित्त और कफ । ये तीनों दोष अपनी प्रकृति अर्थात् समान अवस्था में रहकर शरीर के उपकारक होते हैं और ये ही दोष विषम रूप में विकृत होकर शरीर को नानाप्रकार के रोगों से पीड़ित करते हैं ॥ ६ ॥ तत्र दोषमेकैकं त्रयस्त्रयो रसा जनयन्ति, त्रयस्त्रयश्चोपशमयन्ति । तद्यथा कटुतिक्तकषाया वातं जनयन्ति, मधुराम्ललवणास्त्वेनं शम- यन्ति । कटुकाम्ललवणाः पित्तं जनयन्ति, मधुरतिक्तकषायास्त्वेनं शमयन्ति । मधुराम्ललवणाः श्लेष्माणं जनयन्ति, कटुतिक्तकषाया- स्त्वेनं शमयन्ति ॥ ७ ॥ रसों के प्रभाव—दोषों का शमन करना और दोषों को कुपित करना यह रसों का ही प्रभाव है। इन में तीन तीन रस एक एक दोष को उत्पन्न करते हैं और तीन तीन रस एक एक दोष को शान्त करते हैं। जैसे—कटु, तिक्त और कषाय ये तीन रस वायु को उत्पन्न करते हैं। मधुर, अम्ल और लवण ये तीन रस वायु का शमन करते हैं। कटु, अम्ल और लवण ये तीन रस पित्त को उत्पन्न करते हैं। मधुर, तिक्त और कषाय ये तीन रस पित्त का शमन करते हैं। मधुर, अम्ल और लवण ये तीन रस कफ को उत्पन्न करते हैं और कटु, तिक्त और कषाय ये तीन रस कफ को शमन करते हैं ॥ ७ ॥ रसदोषासन्निपाते तु ये रसा यैर्दोषैः समानगुणाः समा- निष्ठा वा भवन्ति ते तानभिवर्धयन्ति, विपरीतगुणास्तु