चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 598, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें५८० चरकसंहिता [ अ० ८ सामान्यच्छलं नाम यथा-व्याधिप्रशमनायौषधमित्युक्ते परो ब्रूयात्-सत् सत्प्रशमनायेति । ( किंतु ) भवानाह, सन् हि रोगः, सदौ- षधं, यदि च सत् सत्प्रशमनाय भवति, तत्र सन हि कासः, सत् क्षयः, सत्सामान्यात्कासस्ते क्षयप्रशमनाय भविष्यतीति । एतत्सामान्य- च्छलम् ॥ ५६ ॥ सामान्यच्छल—जैसे—व्याधि को शान्त करने के लिये औषध है, ऐसा कहने पर दूसरा कहे कि सत् वस्तु से सत् का प्रशमन होता है । यह आप कहते हैं । रोग भी सत् है । और औषध भी सत् है । यदि सत् वस्तु से सत् वस्तु का प्रशमन होता तो तेरे मत में सत् कास से सत् क्षय का नाश होना चाहिये, क्योंकि सत् धर्म दोनों में समान है । कास भी सत् है क्षय भी सत् है । यह सामान्य छल है ॥ ५६ ॥ अथाहतुः—अहेतुर्नाम प्रकरणसमः संशयसमो वर्ण्यसम इति । अहेतु—वास्तव में जो हेतु न हो । यह तीन प्रकार का है । जैसे—( १ ) प्रकरणसम, ( २ ) संशयसम और ( ३ ) वर्ण्यसम । तत्र प्रकरणसमो नामाहेतुर्यथा—अन्यः शरीरादात्मा नित्य इति पक्षे ब्रूयात्-यस्मादन्यः शरीरादात्मा तस्मान्नित्यः, शरीरं ह्यनित्यमतो विधर्मिणा चाऽऽत्मना भवितव्यमित्येष चाहेतुः, न हि य एव पक्षः स एव हेतुः । प्रकरणसम अहेतु—जैसे कोई कहे कि आत्मा शरीर से भिन्न है । इस पर दूसरा कहे कि आत्मा शरीर से अलग है, इसलिये नित्य है; शरीर अनित्य है । इसलिये आत्मा को विधर्मी होना ही चाहिये, यह अहेतु है । क्योंकि जो पक्ष ( प्रतिज्ञा वा साध्य ) है वही हेतु नहीं हो सकता । संशयसमो नामाहेतुर्य एव संशयहेतुः स एव संशयच्छेदहेतुः । यथा—अयमायुर्वेदकदेशमाह, किंवायं चिकित्सकः स्यान्नवेति संशये परो ब्रूयात्-यस्मादयमायुर्वेदैकदेशमाह तस्माच्चिकित्सकोऽयमिति, न च संशयहेतुं विशेषयत्येष चाहेतुः, न हि य एव संशयहेतुः स एव संशयच्छेदहेतुर्भवति । संशयसम अहेतु—जो हेतु संशय का कारण हो, वही हेतु संशय के नाश का भी कारण हो जाय । जैसे-किसीने आयुर्वेद का कुछ भाग कहा, इसमें संशय हुआ कि यह चिकित्सक है या नहीं ? इस पर दूसरा व्यक्ति कहता है कि-चूंकि इसने आयुर्वेद का कुछ भाग कहा है, इसलिये वह चिकित्सक है ।