चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ८ ] विमानस्थानम् ५८७ तस्य यो यो विशेषो यथा यथा च परीक्षितव्यः स तथा तथा व्याख्यास्यते ॥ ८७ ॥ इस दश प्रकार की परीक्षा में जो जो विशेषता है और जिस जिस प्रकार से परीक्षा करनी चाहिये उसकी उसी २ प्रकार से व्याख्या करते हैं ॥ ८७ ॥ कारणं भिषगित्युक्तमग्रे, तस्य परीक्षा—भिषङ् नाम स यो भेषति, यः सूत्रार्थप्रयोगकुशलः, यस्य चायुः सर्वथा विदितम् यथाव- त्सर्वधातुसाम्यं चिकीर्षन्नात्मानमेवाऽऽदितः परीक्षेत गुणिषु गुणतः कार्याभिनिर्वृत्तिं पश्यन्— कश्चिदहमस्य कार्यस्याभिनिर्वर्तने समर्थो न वेति । तत्रेमे भिषग्गुणा यैरुपपन्नो भिषग्धातुसाम्याभिनिर्वर्तने समर्थो भवति । तद्यथा,-पर्यवदातश्रुतता परिदृष्टकर्मता दाक्ष्यं शौचं जितहस्तता उपकरणवत्ता सर्वेन्द्रियोपपन्नता प्रकृतिज्ञता प्रतिपत्तिज्ञता चेति ॥८८॥ पहिले कहा है कि भिषक् कारण है। इस भिषक् की परीक्षा यह है । जो पीड़ा ( रोग ) को दूर करता, शमन करता है, वह भिषक् है। जो आयुर्वेदीय सूत्रों में, प्रयोग में और कर्म में कुशल है, जिसे रोगी की आयु हित-अहित, सुख-असुख, प्रमाण-अप्रमाण और स्वरूप से भली प्रकार विदित है, शास्त्रज्ञ, कर्म को जानने वाला वैद्य सब धातुओं की समानता करने की इच्छा से सबसे प्रथम अपनी परीक्षा करे । जैसे गुण के योग से कार्य में सफलता को देखता हुआ वैद्य गुणियों अर्थात् भिषग्-द्रव्य, रोगी और परिचारकों में अपनी परीक्षा करे, क्या मैं इस कार्य को करने में समर्थ हूँ वा नहीं । भिषक् के निम्नलिखित गुण हैं जिन गुणों से युक्त होने पर वैद्य धातुसाम्य रूपी कार्य करने में समर्थ होता है । यथा- विमल शास्त्र-ज्ञान, सब प्रकार के कर्म का साक्षात् अनुभव, दक्षता, शस्त्रोपचार आदि में हस्तलाघव, उपकरणों का होना, सब इन्द्रियों से युक्त होना, रोगी की प्रकृति का ज्ञान और प्रतिपत्ति अर्थात् जिस रोगी की जैसी चिकित्सा करनी चाहिये उसका ज्ञान ॥ ८८ ॥ करणं पुनर्भेषजं; भेषजं नाम तद्यदुपकरणायोपकल्पते भिषजो धा- तुसाम्याभिनिर्वृत्तौ प्रयतमानस्य विशेषतश्चोपायान्तरेभ्यः । तद्द्विविधं व्यपाश्रयभेदात् ;-दैवव्यपाश्रयं युक्तिव्यपाश्रयं चेति । तत्र दैवव्यपाश्रयं मन्त्रौषधिमणि-मङ्गलबल्युपहार-होम-नियम-प्रायश्चित्तोपवास-स्वस्त्ययन- प्रणिपात-गमनादि, युक्तिव्यपाश्रयं-संशोधनोपशमने चेष्टाश्च दृष्टफलाः । एतच्चैव भेषजमङ्गभेदादपि द्विविधं द्रव्यभूतमद्रव्यभूतं च । तत्र यद् द्रव्यभूतं तदुपायाभिप्लुतम् । उपायो नाम भयदर्शनबिस्मापन-विस्मारण- क्षोभण-हर्षण-भर्त्सन-वध - बन्ध-स्वप्न - संवाहनादिरमूर्तो भावविशेषो