चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६०४ चरकसंहिता [अ० ८ का विधान है। अन्य तीन, अधिक शीत, अधिक उष्ण, अधिक वृष्टि, हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा इन ऋतुओं में वमनादि कार्य नहीं किये जाते। क्योकि साधा- रण लक्षणों वाली ऋतुएं मन्द शीत, मन्द उष्ण और मन्द वर्षा वाली होने से शरीर के लिये अति सुखकारक एवं ओषधियों का नाश न करने वाली होती हैं। इसलिये उनमें वमन आदि कार्य किये जाते हैं। अन्य तीन (हेमन्त, ग्रीष्म और वर्षा) ऋतुएँ अति शीत, अति गरमी और अति वर्षा वाली होने से शरीर के लिये दुःखदायक और ओषधियों का नाश करने वाली होती हैं। इसलिये इन ऋतुओं में वमन आदि उपाय नहीं किये जाते ॥१२६॥ तत्र हेमन्ते ह्यतिमात्रशीतोपहतत्वाच्छरीरमसुखोपपन्नं भवत्यति- शीतवाताध्मातमतिदारुणीभूतमाबद्धदोषं च, भेषजं पुनः संशोधनार्थ- मुष्णस्वभावं शीतोपहतत्वान्मन्दवीर्यत्वमापद्यते, तस्मात्तयोः संयोगे संशोधनमयौगायोपपद्यते, शरीरमपि च वातोपद्रवाय। इनमें से हेमन्त ऋतु में अधिक शीत होने के कारण शरीर को सुख नहीं मिलता। अति शीत और अति वायु से शरीर विक्षुब्ध, अति कठोर और बहुत भारी दोष युक्त एवं अतिस्तम्भ दोष वाला हो जाता है। उष्ण स्वभाव वालो संशोधनकारी औषध भी शीत के अधिक होने से हीनवीर्य रहती है। इसलिये इस अवस्था में शरीर और औषध का संयोग अयोग अर्थात् अनुचित रहता है। शरीर में भी प्रायः वायु के उपद्रव होने लगते हैं। ग्रीष्मे पुनर्ऋतुशोष्णोपहतत्वाच्छरीरमसुखोपपन्नं भवत्युष्णवातातपा- ध्मातमतिशिथिलमत्यन्तप्रविलोपदोषं, भेषजं पुनः संशोधनार्थमुष्णस्व- भावमुष्णानुगमनात्तीक्ष्णतरत्वमापद्यते, तस्मात्तयोः संयोगे संशोधन- मतियोगायोपपद्यते, शरीरमपि पिपासोपद्रवाय। ग्रीष्म ऋतु में गरमी के अधिक होने से शरीर को सुख नहीं मिलता। इसलिये उष्ण वायु और उष्ण धूप से शरीर फूल जाता अति शिथिल तथा गरमी के कारण दोष बहुत अधिक छिपे (घुले) रहते हैं। संशोधन के लिये जो औषध दी जाती है, उसका स्वभाव उष्ण होता है। यह उष्ण स्वभाव की औषध सूर्य की किरणों के योग से अति उष्ण होकर अति तीक्ष्ण हो जाती है। इसलिये इस अवस्था में शरीर और औषध का संयोग 'अतियोग' हो जाता है। शरीर में भी प्यास के उपद्रव होने लगते हैं। वर्षासु तु मेघजालाववृते गूढार्कचन्द्रतारे धाराकुले वियति भूमौ पङ्क-जल-पटल-संवृतायामत्यर्थोपक्लिन्नशरीरेषु भूतेषु विहतस्वभावेषु च