भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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६६ चरकसंहिता [ अ० ५ दिया । इतना खाना चाहिये जिससे कि अग्नि समान रूप से स्थिर रह सके । जीवन के लिये खाना, खाने के लिये जीना नहीं १ । मात्रा में खाने के फल- मात्रावद्ध्यशनमशितमनुपहत्य प्रकृतिं बल-वर्ण-सुखायुषा योजयत्युप- योक्तारमवश्यमिति ॥ ६ ॥ क्योंकि मात्रा में खाया हुआ आहार प्रकृति और स्वास्थ्य को न बिगाड़ कर उपयोग करने वाले मनुष्य को बल, वर्ण ( कान्ति ), सुख, आयु से युक्त करता है, इसलिये मात्रानुसार भोजन करना चाहिये ॥ ६ ॥ भवन्ति चात्र- गुरु पिष्टमयं तस्मात्तण्डुलान् पृथुकानपि । न जातु भुक्तवान् खादेन्मात्रां खादेद् बुभुक्षितः ॥ ७ ॥ वल्लूरं शुष्कशाकानि शालूकानि बिसानि च । नाभ्यसेद् गौरवान्मांसं कृशं नैवोपयोजयेत् ॥ ८ ॥ कूर्चिकांश्च किलाटांश्च शौकरं गव्यमाहिषे । मत्स्यान्दधि च माषांश्च यवकांश्च न शीलयेत् ॥ ९ ॥ इसलिये भोजन कर चुकने पर भारी पिष्टी से बने चावल, चिवड़ा इनको कभी भी नहीं खाये । मात्रा में भी भोजन करने के बाद इनको नहीं खाना चाहिये । भूखे होनेपर इन पदार्थों को मात्रामें ही खाना चाहिये अधिक नहीं । वल्लूर ( सूखा हुआ मांस ); सूखे हुए शाक-कचरी आदि शालूक (कमल का कन्द ) और बिस मृणाल इनका निरन्तर उपयोग नहीं करना चाहिये । क्योंकि ये पदार्थ गुरु हैं। इसी प्रकार दुर्बल, रुग्ण पशु का मांस भी नहीं खाना चाहिये । ( कूर्चिक ) छाछ के साथ पकाया हुआ दूध, ( किलाट ) छाछ के साथ पकाये हुए दूध का घन ठोस भाग, सुअर का मांस, गाय और भैस का मांस, मच्छलियों का मांस, दही, उड़द और शूक धान्य, जई इनको निरन्तर लगातार नहीं खाना चाहिये ॥ ७-६ ॥ षष्टिकाञ्छालिमुद्गांश्च सैन्धवामलके यवान् । आन्तरीक्षं पयः सर्पिर्जाङ्गलं मधु चाभ्यसेत् ॥ १० ॥ १. लघु भोजन अधिक मात्रा में खाने से अग्नि को सन्दीपन करने का गुण रखते हुये भी शरीर के लिये हानिकारक होंगे, क्योंकि शस्त्र पत्थर पर ही तेज होता है, और पत्थर पर अधिक पैनाने से वह खुन्डा भी बन जाता है । आंख तेजोमय है, वही आंख तेज की अधिकता से बिगड़ भी जाती है ।