चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 85, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्टिक ( साठी चावल ), शालि ( हेमन्त ऋतु में पकने वाले धान्य ), मुद्ग ( मूंग ), सैन्धव ( सेंधा नमक ), आमलक ( आंवले ), यव ( जौ ), आन्तरिक्ष अर्थात् बरसात का जल, दूध, घी, जंगल में होने वाले मृग आदि का मांस और शहद इनका निरन्तर ( अग्नि बल को देखते हुए उचित मात्रा में ) उपयोग करना चाहिये ॥ १० ॥ तच्च नित्यं प्रयुञ्जीत स्वास्थ्यं येनानुवर्तते । अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत् ॥ ११ ॥ जो विशुद्ध क्षीण होते हुए शरीर को पोषण दे और जो न उत्पन्न हुए विकारों वा रोगों को न उत्पन्न करे ऐसा आहार का स्वास्थ्य के लिये नित्यप्रति उपयोग करे । रोगों की उत्पत्ति में 'प्रज्ञापराध' 'परिणाम' और 'असात्म्येन्द्रियार्थ' संयोग ये तीन ही कारण हैं । अतः इनको छोड़कर और सब करना चाहिये, इनका सेवन नहीं करना चाहिये, इनसे बचना चाहिये । ऐसा करने से भावी में रोग उत्पन्न नहीं होंगे ॥ ११ ॥ स्वस्थवृत्त— अत ऊर्ध्वं शरीरस्य कार्यमक्ष्यञ्जनादिकम् । स्वस्थवृत्तमभिप्रेत्य गुणतः संप्रवक्ष्यते ॥ १२ ॥ स्वास्थ्य के लिये आहार विधि को कह कर इस के आगे शारीरिक कार्यों का उपदेश करते हैं । स्वस्थवृत्त अर्थात् स्वास्थ्य की दृष्टि से अञ्जन आदि एवं शारीरिक कार्य उनके गुणों सहित कहते हैं ॥ १२ ॥ सौवीरमञ्जनं नित्यं हितमक्ष्णोः प्रयोजयेत् । पञ्चरात्रेऽष्टरात्रे वा स्रावणार्थे रसाञ्जनम् ॥ १३ ॥ आँख तेजोमय ( अग्नि रूप है ) इसलिये आँख को शरीर के दोष वात, पित्त और कफ इनसे भय बना रहता है । इनमें भी विशेष कर कफ से । इस- लिये श्लेष्मा के जय के लिये पांचवें, छठे दिन तीक्ष्ण अंजन ( रसांजन ) रात्रि में लगाना चाहिये । सौवीराञ्जन को प्रतिदिन आँखों में लगाना चाहिये, क्योंकि यह आँखों के लिये हितकारी है । इससे आँख के तेज की रक्षा होती है, इससे आँखों के दोष दूर नहीं होते । आँखों के दोष दूर करने और आँखों से पानी का दोष निकालने के लिये पांचवें या आठवें दिन दोष के बलाबल की अपेक्षा से रसा- ञ्जन को रात्रि में प्रयोग करना चाहिए ॥ १३ ॥