भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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६८ चरकसंहिता [ अ० ५ चक्षुस्तेजोमयं तस्य विशेषाच्छ्लेष्मतो भयम् । दिवा तन्न प्रयोक्तव्यं नेत्रयोस्तीक्ष्णमञ्जनम् ॥ १४ ॥ विरेकदुर्बला दृष्टिरादित्यं प्राप्य सीदति । तस्मात्स्राव्यं निशायां तु ध्रुवमञ्जनमिष्यते ॥ १५ ॥ ततः श्लेष्महरं कर्म हितं दृष्टेः प्रसादनम् । यथा हि कनकादीनां मणीनां विविधात्मनाम् ॥ १६ ॥ धौतानां निर्मला शुद्धिस्तैल-चेल-कचादिभिः । एवं नेत्रेषु मर्त्यानामञ्जनाश्च्योतनादिभिः ॥ १७ ॥ दृष्टिर्निराकुला भाति निर्मले नभसीन्दुवत् । आँख तेजोमय है, उसे खास करके कफ से भय है । इसलिये विशेषतः दिन में तीक्ष्ण अंजन आँखों में नहीं करना चाहिये । क्योंकि दृष्टि तीक्ष्णांजन के लगाने से एवं दोष के कारण निर्बल होती है, इसलिये सूर्य को नहीं सहती, और यदि सूर्य के सामने अञ्जन दिन में लगाया जाय तो आँख पीड़ित होती है । इसलिए स्रावण अञ्जन को रात्रि में ही लगाना चाहिये १ । श्लेष्मा के निकलने के बाद श्लेष्मा को घटाने वाला और आंख को स्वच्छ करने वाला प्रयोग करना चाहिये । जिस प्रकार की धूल आदि से मैले हुए नाना प्रकार के स्वर्णादि की तैल, ( वस्त्र ), बाल आदि से घिसने पर स्वच्छता होती है इसी प्रकार मनुष्यों की आँख स्रोताञ्जन, निर्मल, ( वातादि दोषों से रहित ) होकर स्वच्छ आकाश में चन्द्रमा के समान चमकती है ॥ १४-१७ ॥ अञ्जन के पीछे दृष्टि के प्रसादन के लिये श्लेष्महर कर्म करने का विधान है । इसलिये अञ्जन के पीछे धूम्रपान कहते हैं । धूम्रप्रयोग की विधि— हरेणुकां प्रियङ्गुं च पृथ्वीकां केशरं नखम् ॥ १८ ॥ ह्रीबेरं चन्दनं पत्रं त्वगेलोशीरपद्मकम् । ध्यामकं मधुकं मांसीं गुग्गुल्वगुरुशर्करम् ॥ १९ ॥ १. कुछ विद्वान् 'सीदति' का अर्थ 'अवजयति' करते हैं । इस प्रकार अर्थ करने से दिन में तीक्ष्ण अंजन का प्रयोग नहीं करना चाहिये । क्योंकि आँख तेजोमय हैं, इसलिये विरेचन ( रात्रि में स्रावण अंजन लगाने ) से निर्बल हुआ व कफ के निकलने से कमजोर पड़ा हुआ दोष श्लेष्मा, प्रातः सूर्य की किरणों में बाकी बचा निकल जाता है । इसलिये वमन की भांति पूर्वाह्न में सूर्य की किरणों में आँखों का स्रावण करना चाहिये और अंजन रात्रि में ही ।