भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

अ० ५] सूत्रस्थानम् ६६ न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थ-प्लक्ष-लोध्र-त्वचः शुभाः । वन्यं सर्जरसं मुस्तं शैलेयं कमलोत्पले ॥ २० ॥ श्रीवेष्टकं शल्लकीं च शुकबर्हमथापि च । पिष्ट्वा लिम्पेच्छरेषीकां तां वर्तिं यवसन्निभाम् ॥ २१ ॥ अङ्गुष्ठसंमितां कुर्यादष्टाङ्गुलसमां भिषक् । शुष्कां निगर्भां तां वर्तिं धूमनेत्रार्पितां नरः ॥ २२ ॥ स्नेहाक्तामग्निसंप्लुष्टां पिबेतप्रायोगिकीं सुखाम् । हरेणुका ( मेहन्दी के बीज ), प्रियंगु, ( फूल प्रियंगु ), पृथ्वीका ( काला जीरा ), केशर ( नाग केशर ), नख ( नखी, एक सुगन्धित द्रव्य है ), 'ह्रीवेर' ( नेत्रबाला ), चन्दन ( श्वेतचन्दन ), पत्र ( तेज पात ), त्वग् ( दालचीनी ), एला ( छोटी इलायची ), उशीर ( खस ), पद्माक ( पद्माख ), ध्यामक ( गन्ध तृण, सुगन्धित तृण ), मधुक ( मुलैहटी ), मांसी ( जटामांसी ), गुग्गुलु ( गूगल ), अगरु ( अगर ), शर्करा ( शर्करा ), न्यग्रोध ( बड़ की छाल ), उदु- म्बर ( गूलर की उत्तम छाल ), अश्वत्थ ( पीपल की उत्तम छाल ), प्लक्ष ( पिलखन की छाल ) और लोध्र ( लोध वृक्ष की उत्तम छाल ), वन्य ( कैवर्त्त मुस्तक, जल मुस्त ), सर्ज रस ( राल ), मुस्त (नागर मोथा), शैलेय (शिलाह्ला) कमल-उत्पल ( कमल और नील कमल इनका केशर ), श्रीवेष्टक ( धूपविशेष ), शल्लकी ( कुन्दरू धूप विशेष, अथवा शिलारस ); और शुकबर्ह ( स्यौणेयक ) इन सब को जल के साथ पीसकर 'शरैषिका' ( सरकण्डा ) के ऊपर, जौ के समान बीच में से मोटी और पासों पर पतली एवं अंगूठे के बराबर मोटी, आठ अंगुल लम्बी बत्ती बना लेनी चाहिये, उसे सूख जाने पर सरकण्डे पर से बीच से खोखली खींच कर उतारनी चाहिये, बत्ती को घी से स्निग्ध करके सुख पूर्वक नित्य प्रति पान करे । यह प्रायोगिक-नित्य पीने योग्य धूम है ॥१८-२२॥ स्नैहिक धूम— वसा-घृत-मधूच्छिष्टैर्युक्तियुक्तैर्वरौषधैः ॥ २३ ॥ वर्तिं मधुरकैः कृत्वा स्नैहिकीं धूममाचरेत् । वसा ( चर्बी ), घृत ( घी ), मधूच्छिष्ट ( मोम ), इनको जीवनीय गण के साथ वर्त्ती बनने योग्य मात्रा में मिलाकर वर्त्ती बना ले । रूक्ष व्यक्ति स्नेहन करने वाले इस स्नैहिक धूम का पान करे; इस धूम का नित्य व्यवहार नहीं करना चाहिये ॥ २३ ॥