भारतकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 639 में से

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७२ चरकसंहिता [ अ० ५ परं द्विकालपायी स्यादहः कालेषु बुद्धिमान् ॥ ३४ ॥ प्रयोगे, स्नैहिके त्वेकं, वैरेच्यं त्रिश्चतुः पिबेत् । यद्यपि धूम्रपान के आठ समय बताये हैं, तथापि बुद्धिमान् को अपने शरीर के दोष वृद्धि, क्षय आदि का विचार करके दिन में आठ समयों में दो समय 'प्रायोगिक धूम' का पान करना चाहिये। स्नैहिक धूम का दिनभर में एक बार, और 'वैरेचनिक' धूम तीन चार बार पीना चाहिये, इससे अधिक नहीं ॥३४॥ ठीक प्रकार से पीये हुए धूमपान के लक्षण- हृत्कण्ठेन्द्रियसंशुद्धिर्लघुत्वं शिरसः शमः ॥ ३५ ॥ यथेरितानां दोषाणां सम्यक् पीतस्य लक्षणम् । हृदय (छाती, उरःस्थल), गला, उरःस्थल का ऊर्ध्वभाग, इन्द्रियाँ- आँख कान नासिका आदि, इनकी स्वच्छता का प्रतीत होना, शिर का हल्कापन दोष-वात, पित्त, कफ, दोषों की शान्ति ये सम्यक् प्रकार से पीये हुए धूम के लक्षण हैं ॥ ३५ ॥ अधिक धूम्रपान के लक्षण- बाधिर्यमान्ध्यं मूकत्वं रक्तपित्तं शिरोभ्रमम् ॥ ३६ ॥ अकाले चातिपीतश्च धूमः कुर्यादुपद्रवान् । (बाधिर्य), बहरापन, (आन्ध्य), आँखों से कम या सर्वथा न दीखना, (मूकत्व), गूंगापन, जीभ से बोला न जाना (रक्तपित्त) पित्त प्रकोप से रक्त विकार होना (शिरोभ्रम) सिर में चक्कर आना, ये रोग अकाल अर्थात् ठीक समय पर धूम न पीने से अथवा अधिक पीने से होते हैं ॥ ३६ ॥ अधिक धूम्रपान से उत्पन्न उपद्रवों की चिकित्सा- तत्रेष्टं सर्पिषः पानं नावनाञ्जनतर्पणम् ॥ ३७ ॥ स्नैहिकं धूमजे दोषे वायुः पित्तानुगो यदि। शीतं तु रक्तपित्ते स्याच्छ्लेष्मपित्ते विरूक्षणम् ॥ ३८ ॥ अधिक धूम्रपान करने पर घी का पिलाना अच्छा है। नस्य, आँखों में अंजन करना और संतर्पण करने वाले स्निग्ध कर्म करने चाहियें । पित्त के कारण जहाँ रक्त दूषित हो वहाँ पर शीतल चिकित्सा, शीतस्पर्श शीत वीर्य वाले द्रव्यों से बनी औषधि नस्य, अंजन आदि कार्य में बरतनी चाहिये, श्लेष्मप्रधान पित्त की अवस्था में 'विरूक्षण' अर्थात् रूक्ष गुण वाले द्रव्यों से नावन अञ्जन कर्म करने चाहिये ॥ ३७-३८ ॥ परं त्वतः प्रवक्ष्यामि धूमो येषां विगर्हितः । न विरिक्तः पिबेद् धूमं न कृते बस्तिकर्मणि ॥ ३९ ॥

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