चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 95, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] सूत्रस्थानम् ७७ तैलाद्दशगुणं शेषं कषायमवतारयेत् ॥ ६४ ॥ तेन तैलं कषायेण दशकृत्वो विपाचयेत् । अथास्य दशमे पाके समांशं छागलं पयः ॥ ६५ ॥ दद्यादेषोऽणुतैलस्य नावनीयस्य संविधिः । चन्दन, अगर, तेजपत्र, वायविडंग, बेल वृक्ष की जड़, नील कमल पुण्डरीक, श्वेत कमल, छोटी इलायची, दारूहल्दी की छाल, मुलेहटी, बला खरैटी, नेत्रबाला, जंगी, हरड़, वन्य (कैवर्त्तमुस्ता या मुद्गपर्णी), त्वक् ( दाल चीनी ), नागर मोथा, अनन्तमूल, शालपर्णी, जीवन्ती, पीठवन, देवदारु, शतावर, रेणुकाबीज, बड़ी कटेरी, छोटी कटेरी, सल्लकी, पद्म केशर, (कमल का केशर ), इन को निर्मल, आकाश से बरसे सौ गुने वृष्टि के जल में पकाना चाहिये और तैल से दस गुना ( दशांश भाग ) रहने पर कषाय को उतार कर छान ले । इस कषाय के दस भाग करके प्रत्येक में उस तैल को पकाये, अर्थात् प्रथम एक भाग के साथ तैल सिद्ध करे, फिर उसी तैल का दूसरे भाग के साथ, इसी प्रकार दसों भागों के साथ तैल सिद्ध कर लेने पर दसवें भाग में समांश तैल के बराबर बकरी का दूध कषाय में मिला दे । यह नस्य कर्म के योग्य अणु तैल बनाने की विधि है १ ॥ ६१-६५ ॥ अस्य मात्रां प्रयुञ्जीत तैलस्यार्धपलोन्मिताम् ॥ ६६ ॥ स्निग्धस्विन्नोत्तमाङ्गस्य पिचुना नावनैस्त्रिभिः । त्र्यहात्त्र्यहाच्च सप्ताहमैतत्कर्म समाचरेत् ॥ ६७ ॥ निवातोष्णसमाचारी हिताशी नियतेन्द्रियः । तैलमेतत्रिदोषघ्नमिन्द्रियाणां बलप्रदम् ॥ ६८ ॥ प्रयुञ्जानो यथाकालं यथोक्तान्श्नुते गुणान् । इस तैल की अर्धपल अर्थात् ( दो तोला ) मात्रा को ले शिर के तेल लगा कर, चिकना कर के एवं पसीना लेकर तब रूई के फांये से तीन बार नस्य देना चाहिये । १. "अकल्कोऽपि भवेत्स्नेह्य यः साध्यः केवलै द्रवे" इस परिभाषा के अनुसार चन्दन आदि पदार्थों को ऊखल में कूट कर ५० तोले परिमित लेकर ४०० तोले पानी में क्वाथ करना चाहिये । ४० तोले रहने पर छान कर दस भाग कर लेने चाहिये । और एक भाग के बराबर अर्थात् ४ तोले तिल तैल मिला कर पाक पूर्व विधि से करना चाहिये । इस प्रकार ६ बार करके दसवीं बार बकरी का दूध ४ तोले मिला कर तैल पाक कर लेना चाहिये । यह अणु तैल विधि है । अणु तैल का नस्य सप्ताह में लगभग दो बार लेना चाहिये ।