भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 616 में से

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पृष्ठ 127

११२ चरकसंहिता [ अ० ८ समय तक रुक जाता है। इसको 'उपविष्टक' कहते हैं। और जो गर्भिणी प्राय. उपवास करती है या कुत्सित आहार का सेवन करती है, घी आदि स्नेह से द्वेष करती है, वात-प्रकोपक कारणो का सेवन करती है, उसका भी गर्भ वृद्धि को प्राप्त नही होता, क्योंकि वह गर्भ शुष्क हो जाता है ! वह गर्भ बहुत समय तक गर्भाशय में रुका रहता है। इसके अन्दर हरकते नहीं होती। इसको 'नागोदर' कहते है ॥ २४ ॥ नार्‍योस्तयोरुभयोरपि चिकित्सितविशेषमुपदेक्ष्यामः-भौतिक-जीवनी- य-बृहणीय-मधुर-वातहर-सिद्धाना सर्पिषामुपयोगः, नागोदरे तु योनिव्या- पन्निद्दिष्टपयसामामगर्भाणा गर्भद्वद्धिकराणा च, सम्भोजनमेतैरेव सिद्धैश्च घृतादिभिः सुभिक्षायाः, अभीक्ष्ण यान-वाहनावमार्जनावजृम्भणैरुपपा- दनमिति ॥ २५ ॥ उपरोक्त दोनों प्रकार की स्त्रियो की विशेष चिकित्सा का उपदेश करते है - भूतों (सूक्ष्म जन्तुओं को दूर करन) के लिये उपयोगी गुग्गुलु सरसों आदि अथवा महापैशाचादि घृत, जीवनीय, बृहणीय, मधुर और वातहर ओषधियों से सिद्ध घृत का उपयोग करना चाहिये। नागोदर गर्भ को अवस्था मे योनि व्यापत् अधिकार में कहे घृता का तथा आम-गर्भ और गर्भ को वृद्धि करने वाले भोजनों का उपयोग और इनसे ही सिद्ध वृतों का उपयोग करना चाहिये । यान, वाहन, शरीर शुद्धि, जृम्भण आदि कर्मों को बार बार करना चाहिये ॥ २५ ॥ यस्याः पुनर्गर्भः प्रसुप्तो न स्पन्दते ता श्येन-मत्स्य-गवय तित्तिर-ताम्र- चूड-शिखिनामन्पतमस्य सर्पिष्मता रसेन माषयूषेण वा प्रभूतसर्पिषा मूलकयूषेण वा रक्तशालीनामोदन मृदु-मधुर-शीतल भोजयेत्, तैलाभ्य- क्तेन चास्या अभीक्ष्णमुदरवक्षणोरु-कटी-पार्श्व-पृष्ठ-प्रदेशानीषदुष्णे नोपाचरेत् ॥ २६ ॥ जिस गर्भिणी मे सोया हुआ गर्भ गति न करे उस स्त्री को श्येन, मछली, गवय, मोर कुक्कुट या तीतर इनके मास रस के साथ घी अथवा माषयूष के साथ पर्याप्त घी, मूली के यूष के साथ लाल चावलो का मधुर, मृदु, शीतल भात खिलाना चाहिये । इस स्त्री के शरीर पर तैल की मालिश करके हलके गरम पानी से उदर, पेट, जाघ, कटी, पीठ और पार्श्व का बार बार स्नान कराना चाहिये ॥ २६ ॥ यस्याः पुनरुदावर्त्त-विवन्धः स्यादष्टमे मासे न चानुवासनसाध्यं मन्येत, ततस्तस्यास्तद्विकारप्रशमनमुपकल्पयेन्निरूहम् । उदावर्तो ह्युपे-