चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ८] ८ शारीरस्थानम् ११३ क्षितः सहसा सगर्भा गर्भिणीं गर्भमथवाऽतिपातयेत् । तत्र वीरण-शालि षष्टिक-कुश-काशेक्षुवालिका-वेतस-परिव्याध-मूलानां भूतीकानन्ता- काश्मर्य-परूषक-मधुक-मृद्वीकाना च पयसाऽर्धोदकेनोद्गमय्य रस प्रियाळ-विभीतक-मज्ज-तिलकल्क- संप्रयुक्तमीषल्लवणमनत्युष्णं निरूहं दद्यात् । व्यपगतविवन्धां चेना सुख-सालल-परिषिक्ताङ्गी स्थैर्यकरमवि- दाहिनमाहार भुक्तवती साय मधुकसिद्धेन तैलेनानुवासयेत् । न्युब्जां त्वेनामास्थापनानु वासनाभ्यामुपचरेत् ॥ २७ ॥ जिस स्त्री का आठवे मास में उदावर्त्त रोग आ पड़े और अनुवासन बस्ति का प्रयोग उचित न हो, तो इस रोग का मिटाने क लिये उचित निरूह बस्ति का प्रयोग करना चाहिये । उपेक्षा किया हुआ यह उदावर्त्त रोग अचानक ही गर्भ के साथ गर्भिणी का अथवा गर्भ को ही नष्ट कर देता है। उदावर्त्त रोग की शान्ति के लिये वीरण, शालिधान्य, कुश, काश, गन्ना, वेतस, परिव्याध (वेतस का भेद) इनकी जड़, भूतीक, सारिवा, गम्भारी, फालसा, मुलैहठी, किशमिश इनके पानी से अधवे दूध मे क्वाथ तैयार करना चाहिये । इस क्वाथ में पियाल, बहेड़ा की मज्जा और तिल इनका कल्क डाल कर सिद्ध किये तथा कुछ नमकीन बना कर अल्प गरम बस्ति (निरूह) देनी चाहिये । रुका- वट हट जाने पर थोड़े गरम पानी से स्नान कराके, स्थिरता करने वाला, अविदाही भोजन खिलाना चाहिये । सायंकाल (मधुक) मुलैहठी सिद्ध तैल से अनुवासन बस्ति देना चाहिये । औंधी लेटी गर्भिणी को आस्थापन तथा अनुवासन द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये । [उदर शूल के कारण गर्भिणी की यह स्थिति स्वयं हो जाती है ] ॥२७॥ यस्याः पुनरतिमात्रदोषोपचयाद्वा तीक्ष्णोष्णातिमात्रसेवनाद्वा वात- मूत्र पुरीष-वेग-धारणैर्वा विषमासन-शयन-स्थान-सपीडनाभिघातैर्वा क्रोध-शोकेर्ष्या सूया-भय-त्रासादिभिर्वा साहसेर्वाऽपरैः कर्मभिरन्तः कुक्षे- र्गर्भो म्रियते, तस्याः स्तिमित स्तब्धमुदरमाततं शीतमश्मान्तर्गतमिव भव- त्य स्पन्दनो गर्भः शूलमधिकमुपजायते । न चाव्यः प्रादुर्भवन्ति । योनिनै प्रस्रवत्यक्षिणी चास्याः स्रस्ते भवतस्ताम्यति व्यथते भ्रमते श्वसित्यर- तिबहुला च भवति । न चास्या वेगप्रादुर्भावो यथावदुपलभ्यत इत्येव- लक्षणां स्त्रियं मृतगर्भेयमिति विद्यात् ॥ २८ ॥ जिस गर्भिणी में दोषों के अधिक संचय होने से अथवा अति तीक्ष्ण या अति उष्ण पदार्थों के सेवन से, वायु, मूत्र, मल के वेगों को रोकने से, विषम