चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें११४ चरकसंहिता [ अ० ८ आसन, विषम शयन, विषम स्थान, पीड़न या चोट आदि से, क्रोध, शोक, भय, ईर्षा, त्रास आदि से अथवा अन्य साहसिक कार्यों के कारण गर्भ गर्भाशय के भीतर ही मर जाता है, उसमें इसके कारण पेट, चमडे मे ढपा, जैसा निश्चल, फैला, शीतल हो जाता है । उदर में पत्थर सा पडा हुआ प्रतीत होता है । गर्भ में स्पन्दन नहीं होता, दर्द बहुत बढ़ जाती है । प्रसवकालिक दर्दें उत्पन्न नहीं होतीं । योनि से किसी प्रकार का स्राव नहीं आता । आखे अपने आप बाहर निकलती है, स्त्री भय से कातर हो जाती है । अन्धकार सा दीखता है, पीड़ा होती है, चक्कर आते हैं, श्वास बहुत जोर से चलता है । ठीक प्रकार से वेगों की उत्पत्ति नहीं होती । इन लक्षणों से समझ लेना चाहिये कि इस स्त्री का गर्भ मर गया है ॥ २८ ॥ तस्य गर्भशल्यस्य जरायुप्रपातनं कर्म संशमनमित्याहुरेके । मन्त्रा- दिकमथर्ववेदविहितमित्येके । परिदृष्टकर्मणा शल्यहर्त्राऽऽहरणमि- त्येके ॥ २९ ॥ व्यपगतगर्भशल्यां तु स्त्रियममगर्भां सुराशीध्वरिष्ट मधु-मदिरासवा- नामन्यतममग्रे सामर्थ्यतः पाययेद् गर्भकोष्ठाविशुद्ध्यर्थमार्त्तिविस्म- रणार्थं प्रहर्षणार्थं च । अतः परं हृद्यैर्बलानुरक्षिभिरस्नेह-संप्रयुक्तै- र्यवाग्वादिभिर्वा तत्कालयोगिभिराहारैरुपचरेदाव-धातु-क्लेद-विशोषण- मात्रं कालम् । अतः परं स्नेहपानैर्वस्तिभिराहारविधिभिश्च दीपनीय- जीवनीय-बृहणीय-मधुर-वातहर-समाख्यातैरुपचरेत् । परिपक्वगर्भशल्या- याः पुनविमुक्तगर्भशल्यायास्तदहरेव स्नेहोपचारः स्यात् ॥ ३० ॥ इस मृत गर्भ रूपी शल्य को बाहर करने के लिये जरायु को निकालने की विधि बरतनी चाहिये ऐसा कईयों का मत है । अथर्ववेदोक्त मंत्रों से कार्य करना चाहिये यह दूसरों का मत है । जिस वैद्य ने इस कर्म को देखा हुआ हो शल्य निकालने वाले उस वैद्य द्वारा यह काम करवाना चाहिये यह तीसरो का मत है । दोष, धातु, क्लेद इनकी समय पर शान्ति रहे, इसलिये कच्चे गर्भ (शल्य) के निकल जाने पर स्त्री को प्रथम सुरा, शीधु, अरिष्ट, मधु, मदिरा, आसव इनमें से कोई एक पदार्थ शक्ति अनुसार पिला देना चाहिये । जिससे कि गर्भाशय की शुद्धि हो जाये तथा दर्द को भूल जाये और मन में प्रसन्नता आ जाये । इसके पीछे बल की रक्षा करने वाली घी आदि स्नेह से रहित यवागू, आदि तत्कालोचित आहार तब तक देवे जब तक दोषयुक्त धातु की क्लिन्नता न सूख जाये । इसके पश्चात् स्नेह-पान स्नेह बस्तिया, तथा दीपनीय,