भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ८ ] शारीरस्थानम् ११५ जीवनीय, बृंहणीय, मधुर और वातनाशक आहार देना चाहिये । जिस स्त्री का गर्भ-शल्य पूर्ण परिपक्व होकर फिर निकले उस स्त्री को उसी दिन ( जिस दिन मृत गर्भ बाहर आवे ) स्नेह क्रिया ( स्नेह पान, स्नेहयुक्त भोजन ) देनी चाहिये ॥ २६-३० ॥ परमतोनिविकारमाप्यायमानस्य गर्भस्य मासे मासे कर्मोपदक्ष्यामः । प्रथमे मासे शङ्किता चेद् गर्भमापन्ना क्षीरमनुपस्कृतं मात्रावच्छीतं काले काले पिबेदन्तर्वत्नी, सात्म्यमेव च पुनर्भोजनं सायं प्रातश्च भुञ्जीत । द्वितीये मासे क्षीरमेव च मधुरौषधसिद्धम् , तृतीये मासे क्षीरं मधुस- र्पिर्भ्यामुपसंसृज्य । चतुर्थे मासे तु क्षीरनवनीतमक्षमात्रमश्नीयात् । पञ्चमे मासे क्षीरसर्पिः । षष्ठे मासे क्षीर-सर्पिर्मधुरौषध-सिद्धम् । तदेव सप्तमे मासे । तत्र गर्भस्य केशा जायमाना मातुर्विदाहं जनयन्तीति स्त्रियो भाषन्ते, तन्नेति भगवानात्रेयः । किंतु गर्भोत्पीडनाद्धि वातपित्त- श्लेष्माण उरः प्राप्य विदहन्ति । ततः कण्डूरूपजायते, कण्डूमूला च किक्कि- शावाविर्भवति । तत्र कोलोदकेन नवनीतस्य मधुरौषधसिद्धस्य पाणि- तलमात्र काले कालेऽस्यै दद्यात् । चन्दन-मृणाल-कल्केश्चास्याः स्तनादर विमृदनीयात् शिरीष धातकी-सर्षप-मधुक-चूर्णैःकुटजार्जक-बीज-मुस्त- हरिद्रा-कल्कैर्वा निम्ब-कोल-सुर-मञ्जिष्ठा-कल्कैर्वा पृषत हरिण-शश-रुधिर- युतया त्रिफलया वा । करवीरपत्रसिद्धेन वा तैलेनाभ्यङ्ग, परिषेकः पुन- र्मालतीमधुकसिद्धेनाम्भसा । जातकण्डूश्च कण्डूयनं वर्जयेत्त्वग्भेद-वैरू- प्य-परिहारार्थं, असह्यायां तु कण्ड्वामुन्मर्दनोद्धर्षणाभ्यां परिहारः स्यात् । मधुरमाहारजातं वातहरमल्पमस्नेहलवणमल्पोदकानुपानं च भुञ्जीत । अष्टमे मासे क्षीरयवागू सर्पिष्मतीं काले काले पिबेत् । इसके आगे स्वस्थ गर्भ के लिये प्रत्येक मास में करने योग्य कर्मों का उप- देश करते है । यदि प्रथम मास में गर्भ रह जाने की शंका हो तो गर्भवती स्त्री कच्चे दूध को मात्रा मे थोड़ा थोड़ा करके दिन मे कई बार पीये । प्रातः और सायं काल सात्म्य भोजन करे । दूसरे महीने में मधुर ( मुलहट्टी आदि ) औष- धियों से सिद्ध दूध का पान करे । तीसरे मास में दूध को मधु और घी के साथ मिलाकर सेवन करे । चौथे मास में दूध को तोले भर मक्खन के साथ खाये । पाचवे मास मे घी और दूध को । छठे मास में मधुर औषधियों से सिद्ध घी, दूध का सेवन करे । यही सातवें मास में खाये । गर्भ के उत्पन्न होते हुए केश माता के देह में जलन उत्पन्न करते हैं—ऐसा स्त्रियां कहती हैं । भगवान् आत्रेय का कहना है कि यह ठीक नहीं है,