चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११६ चरकसंहिता [ अ० ८ तीसरे मास में ही केश बनने आरम्भ हो जाते है, सातवें मे नही ] परन्तु गर्भ के उत्साडन के कारण वात, पित्त, कफ छाती में आकर जलन उत्पन्न करते है। इस जलन से खाज उत्पन्न होती है । खाज के कारण ही किक्किश अर्थात् चर्म का फटना होता है। इसके लिये बेर के पत्तों के पानी से मधुर औषधियो से सस्कृत मक्खन की पाणितल ( चुल्लू भर ) मात्रा को थोड़ी थोड़ी देर मे देना चाहिये । चन्दन, और बिस इनके कल्क से स्तन और उदर के बीच में लेप करना चाहिये । अथवा सिरस, धाय के फूल, सरसो, महुवा, इनके चूणो से, या कुड़े, अर्जक बीज, मुस्ता, हल्दी इनके कल्क से, अथवा नीम, बेर, तुलसी, मजोठ इनके कल्क से, या पृषत्-हरिण, खरगोश इनके रक्त में मिले त्रिफला से स्तन और उदर पर लेप करना चाहिये । अथवा कनेर के पत्तों से सिद्ध तैल की मालिश करनी चाहिये । चमेली, मुलहठी से सस्कृत पानी में स्नान कराना चाहिये । खाज उठने पर स्त्री नहीं खुजावै जिससे कि त्वचा न फटे या रंग परिवर्त्तित न हो। यदि खाज असह्य हो तो मर्दन या उद्घर्षण ( उबटन आदि ) से शान्त करनी चाहिये । खाने के लिये मधुर वातनाशक, थोड़े स्नेहवाला, नमकीन आहार, थोड़े पानी के साथ खाना चाहिये । आठवे मास में घी से युक्त दूध में बनी यवागू खावे । तन्नेति भद्रकाप्यः, पैङ्गल्याबाधो ह्यस्या गर्भमागच्छेदिति । अस्त्वत्र पैङ्गल्याबाध इत्याह भगवान् पुनर्वसुरात्रेयः, नत्वेवैतन्न कार्य, एवं कुर्वती ह्यरोगाऽऽरोग्य-बल-वर्ण-स्वर-सहनन-सपदुपेतं ज्ञातीना श्रेष्ठमपत्य जनयति । नवमे तु खल्वेना मासे मधुरौषधसिद्धेन तैले- नानुवासयेत्, अतश्चावास्यास्तलपिचु योनौ प्रणयेद्गर्भस्थानमार्गस्ने- हनार्थम् । यदिदं कर्म प्रथम मासमुपादायोपदिष्टमानवमान्मासात्। तेन गर्भिण्या गर्भसमये गर्भधारणे कुक्षिकटीपार्श्वपृष्ठ मृदु भवति । वातश्चानुलोमः संपद्यते, मूत्रपुरीषे च प्रकृतिभूते सुखेन मार्गावापद्येते, चर्मनखानि च मार्दवमुपयान्ति, बलवर्णौ चोपचीयेते, पुत्रं चेष्ट सपदु- पेत सुखिन सुखेनैषा काले प्रजायत इति ॥ ३१ ॥ भद्रकाप्य ऋषि का कहना है कि यह ठीक नही है। क्योंकि इस प्रकार करने से गर्भ की आखें पीली हो जाएगी। भगवान् पुनर्वसु आत्रेय का कथन है कि भले ही गर्भ मे पिंगलता का दोष आजाये तथापि आठवे मास में घी युक्त यवागू ही देनी चाहिये । क्योकि ऐसा करने से रोगरहित नीरोग, बल, वर्ण स्वर, शरीर इनके उत्तम गुणों से युक्त, बान्धवों में श्रेष्ठ सन्तान उत्पन्न होती