भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

१२४ चरकसंहिता [ अ० ८

ज्यात्, एषामेव तैलौषधानां चूर्णेनावचूर्णयेत्, एष नाडीकल्पनविधि- रुक्तः सम्यक् ॥ ४६ ॥ इसके पश्चात् नाड़ी के काटने की विधि का उपदेश करते हैं । नाभिबन्ध से लेकर आठ अगुल ऊपर एक, और उससे जरा ऊपर दूसरा बन्धन लगा कर उन दोनों बन्धनों के बीच के अन्तर में मध्यभाग को धीरे से पकड़ कर स्वर्ण, चांदी या लोहे के बने किसी एक तेज अर्धधार शस्त्र से नाड़ी काट दे । नाल के अग्रभाग मे धागा बांधकर धीरे से (ढीली) गले म बाँध देनी चाहिये । यदि बच्चे की नाभि पक जाए तो—लोध, मुलहठी, फूलप्रियंगु, देवदार हल्दी इनके कल्क द्वारा संस्कृत तैल को लगाकर इन्हीं ओषधियो के चूर्ण को ऊपर से छिड़क देना चाहिये । यह नाड़ी कल्पन करने की विधि कह दी है ॥ ४६ ॥ असम्यक्कल्पने हि नाड्या आयाम-व्यायामोत्तुण्डिका-पिण्डलिका- विनामिका-विजृम्भिका-संज्ञेभ्यो भयम् । तत्राविदाहिभिर्वात-पित्त-प्रश- मनैरभ्यङ्गोत्सादन-परिषेके सर्पिर्भिश्चोपक्रमेत गुरुलाघवमभिस- मीक्ष्य ॥ ४७ ॥ नाड़ी के भली प्रकार न काटने से नाड़ी की आयाम ( लम्बाई ), व्यायाम चौड़ाई ( विस्तार ), हुण्डिका, [ लम्बा और मोटापन ], पिण्डलिका [ गोल चक्कर के आकार की ], विनामिका [ किनारों से ऊची, बीच में दबी ], विजृ- म्भिका [ बार बार बढ़ने घटने वालो ] आदि रोग हो जाते हैं । दोषों की गुरुता लघुता देख कर दाह उत्पन्न न करने वाले वात पित्त को शान्त करने वाले घृतो से तैलमर्दन, उबटन और स्नान आदि करावे ॥ ४७ ॥ ततोऽनन्तर जातकर्म कुमारस्य कार्यम् । तद्यथा—मधुसर्पिषी मन्त्रोपमन्त्रिते यथाम्नायं प्रथम प्राशितुमस्मै दद्यात्, स्तनमत ऊर्ध्व- मेतेनैव विधिना दक्षिणं पातु पुरस्तात्प्रयच्छत्, अथातः शीर्षतः स्थापयेदुदकुम्भं मन्त्रोपमन्त्रितम् । अथास्य रक्षा विदध्यात्—आदनी- खदिर कर्कन्धु-पीलु-परूषक-शाखाभिरस्य गृह भिषक्समन्ततः परि- वारयेत्, सर्वतश्च सूतिकागारस्य सर्पपातसी-तण्डुल-कण-कणिकाः प्रकि- रेयुः, तथा तण्डुल-बलि-होमः सततमुभयतः काल क्रियेताऽऽनामकर्मणः। द्वारे च मुसल देहलीमनुतिरश्चीनं न्यस्तं कुर्यात्, वचा-कुष्ठक्षौमक-हिङ्गु- सर्षपातसी-लशुन-कण-कणिकानां रक्षोघ्नसमाख्यातानां चौषधीना पोट्टलिकां बद्ध्वा सूतिकागारस्थोत्तरदेहल्यामवसृजेत्तथा सूतिकायाः कण्ठे सपुत्रायाः स्थाल्युदक-कुम्भ-पर्यङ्केष्वपि तथैव च, द्वयोर्द्वारपक्षयोः