चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 268, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें२५४ चरकसंहिता [ अ० २ न तस्य लिङ्गशैथिल्यं स्यान्न शुक्रक्षयो निशि ॥ ४६ ॥ इति वृष्यमांसम् । (१) जो पुरुष चटक के मास को भर पेट खाकर ऊपर से दूध पी लेता है, उसका बल (लिंग) शिथिल नहीं होता और रात भर वीर्य का क्षय नहीं होता, यह वीर्यस्तम्भक है ॥ ४६ ॥ माषयूषेण यो भुक्त्वा घृताढ्य षष्टिकौदनम् । पयः पिबति रात्रि स कृत्स्नां जागर्ति वेगवान् ॥ ४७ ॥ इति वृष्यमाषयोगः । (२) खूब घी वाले साठी के चावलों को उड़द के यूष के साथ खाकर जो ऊपर से दूध पी लेता है, वह काम-वेग से आतुर होकर सारी रात जागता रहता है ॥ ४७ ॥ न रात्रिषु स्वपिति ना निस्तब्धेन च शेफसा । तृप्तः कुक्कुटमांसाना भृष्टानां नक्ररेतसि ॥ ४८ ॥ इति वृष्यं भृष्टमासम् । (३) मुर्गे के मास को नक्र के रेत में भून कर खाने से पुरुष स्तब्धलिंग होकर सारी रात नहीं सोता । उसके सारी गत ध्वज-हर्ष करता है ॥ ४८ ॥ निःस्राव्य मत्स्याण्डरस भृष्टं सर्पिषि भक्षयेत् । हंसबर्हिणदक्षाणा चैवमण्डानि भक्षयेत् ॥ ४९ ॥ इति वृष्या अण्डरसाः । (४) मछली के अण्डों के रस को निकाल कर इसको घी में भून कर खावे । इसी प्रकार से हंस, मोर और मुर्गी के अण्डे का भी रस भून कर खावे ॥ ४९ ॥ भवतश्चात्र—स्रोतःसु शुद्धेष्वमले शरीरे वृष्य यदा ना मितमत्ति काले । वृषायते तेन परं मनुष्यस्तद् बृंहणं चैव बलप्रदं च ॥ ५० ॥ तस्मात्पुरा शोधनमेव कार्यं बलानुरूपं न हि वृष्ययोगाः । सिध्यन्ति देहे मलिने प्रयुक्ताः क्लिष्टे यथा वाससि रागयोगाः ॥५१॥ शुक्रवह आदि स्रोतों के शुद्ध होने पर, शरीर के निर्मल (धुला) होने पर, उचित समय पर उचित मात्रा में जो वृष्य वस्तुओं का सेवन करता है उसका वीर्य और पुंस्त्वशक्ति बढ़ जाती है । उसको यह बृंहण और बलवर्धक होता है । इसलिये वृष्य प्रयोग सेवन करने से पूर्व बलानुसार शरीर का वमन, विरेचन आदि से शोधन कर लेना चाहिये । जिस प्रकार मलिन वस्त्र पर रंग