भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 304

२६० चरकसंहिता [ अ० ३ दोषे विबद्धे नष्टेऽग्नौ सर्वसम्पूर्णलक्षणः । सन्निपातज्वरोऽसाध्यः कृच्छ्रसाध्यस्त्वतोऽन्यथा ॥ ११०॥ सन्निपात ज्वर की साध्य-असाध्यता—यदि दोष (वातादि और मल) शरीर के अन्दर ही रुक जाये, अग्नि मन्द हो, सन्निपात ज्वर के सम्पूर्ण लक्षण दिखाई देते हो तो सन्निपात ज्वर असाध्य है । यदि सम्पूर्ण लक्षण दिखाई न दे, दोष बाहर आते हो, अग्नि भी प्रबल हो तो रोग कष्टसाध्य होता है ॥११०॥ निदाने त्रिविधा प्रोक्ता या पृथग्ज्वराकृतिः । संसर्गसन्निपाताना तथा चोक्तं स्वलक्षणम् ॥ १११ ॥ ज्वरनिदान-स्थान मे वर्णित पृथक् पृथक् दोषो से उत्पन्न होने वाले ज्वरो के तीन प्रकार के लक्षण, द्वन्द्वज ज्वरो तथा सन्निपातज ज्वरो के लक्षण मिला कर सात प्रकार के ज्वर कह दिये है ॥ १११ ॥ आगन्तुरष्टमो यस्तु स निर्दिष्टश्चतुर्विधः । अभिघाताभिषङ्गाभ्यामभिचाराभिशापतः ॥ ११२ ॥ आठवाँ आगन्तुज ज्वर चार प्रकार का है । जैसे—अभिघातजन्य, अभि- षग्जन्य, अभिचारजन्य और अभिशापजन्य ॥ ११२ ॥ शस्त्रलोष्टकशाकाष्ठमुष्ट्यरत्नितलद्विजैः । तद्विधैश्च हते गात्रे ज्वरः स्यादभिघातजः ॥ ११३ ॥ तत्राभिघातजे वायुः प्रायो रक्तं प्रदूषयन् । सव्यथाशोफवैवर्ण्यं करोति सरुजं ज्वरम् ॥ ११४ ॥ इनमे अभिघातजन्य ज्वर—शस्त्र, ढेला, कशा, लकडी, मुक्का, अरत्नि, हाथ पैर के तले, दाँत तथा अन्य इसी प्रकार के कारणो से देह या अगो पर चोट लगने से उत्पन्न होता है । अभिघातजन्य ज्वर मे प्रायः करके वायु रक्त को दूषित कर पीडा, सूजन, विवर्णता (रग परिवर्त्तन), वेदना तथा ज्वर उत्पन्न करता है ॥ ११३-११४ ॥ कामशोकभयक्रोधैरभिषक्तस्य यो ज्वरः । सोऽभिषङ्गज्वरो ज्ञेयो यश्च भूताभिषङ्गजः ॥ ११५ ॥ कामशोकभयाद्वायुः क्रोधात्पित्तं त्रयो मलाः । भूताभिषङ्गात्कुप्यन्ति भूतसामान्यलक्षणाः ॥ ११६ ॥ भूताधिकारे व्याख्यातं तदष्टविधलक्षणम् । धौंकनी के तुल्य हो, गिर पडे, सो जाय, बके, उसे अभिन्यास ज्वर कहते है । यह सन्निपात-ज्वर असाध्य है ।