चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
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अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् २६१
अभिषङ्गजन्य ज्वर—काम शोक, भय क्रोध तथा भूतो के संसर्ग से
आक्रान्त होने पर जो ज्वर उत्पन्न होता है, उसको अभिषङ्गज ज्वर कहते हैं।
काम शोक और भय से वायु, क्रोध से पित्त, और भूता के आक्रमण से तीनो
दोष कुपित होते है। भूतजन्य ज्वर मे भूता के सामान्य लक्षण रहते है। आठ
प्रकार के भूतो के लक्षण भूताधिकार (उन्माद चिकित्सा) मे कहेगे ॥११५-११६॥
विषवृक्षानिलस्पर्शात्तथाऽन्यैर्विषसंभवै ॥ ११७ ॥
अभिषक्तस्य चाप्याहुर्ज्वरमेकेऽभिषङ्गजम् ।
चिकित्सया विषघ्न्यैव प्रशमं लभते नरः ॥ ११८ ॥
कुछ आचार्यो का कहना है कि विषैले वृक्षो की वायु का स्पर्श तथा
अन्य इसी प्रकार विषयुक्त कारणो से उत्पन्न ज्वर अभिषङ्गजन्य ज्वर है।
इस प्रकार का ज्वर विषनाशक चिकित्सा से शान्त होता है। [विष से उत्पन्न
ज्वर मे मुख पर काली झांई, दाह, अतीसार और दिल का रुकना, भोजन मे
अनिच्छा, कपकपी, मूर्छा ओर बल की हानि होती है सु०।] ॥ ११७-११८ ॥
अभिचाराभिशापाभ्यां सिद्धानां यः प्रवर्तते ।
सन्निपातज्वरो घोरः स विज्ञेयः सुदुःसहः ॥ ११९ ॥
सन्निपातज्वरस्योक्तं लिङ्गं यत्तस्य तत्स्मृतम् ।
चित्तेन्द्रियशरीराणामार्तयोऽन्याश्च नैकशः ॥ १२० ॥
सिद्ध पुरुषो के अभिचार (हिंसा के लिये किये होम आदि से) या अनि-
शाप द्वारा जो सन्निपात ज्वर उत्पन्न होता है, वह अतिशय कष्टसाध्य होता है।
सन्निपात ज्वर के लक्षण ही इस ज्वर के लक्षण होते है। चित्त, इन्द्रिय और
शरीर की अन्य पीडाये रोगी को दुःख देती हैं १ ॥ ११९-१२० ॥
प्रयोगं त्वभिचारस्य दृष्ट्वा शापस्य चैव हि ।
स्वयं श्रुत्वाऽनुमानेन लक्ष्यते प्रशमेन वा ॥ १२१ ॥
१ वृद्ध वाग्भट मे निम्न लक्षण कहे ह—
तत्राभिचारिकैर्मन्त्रैर्हूयमानस्य तप्यते ।
पूर्वं चेतस्ततो देह. ततो विस्फोटतृड्भ्रमे ।
सदाहमूर्च्छाग्रस्तस्य प्रत्यहं वर्धते ज्वर ॥
आभिचारिक मन्त्रो से हवन करने से पहले, चित्त और फिर देह तपता हे।
अनन्तर देह पर फुसिये, प्यास और भ्रम होता है, दाह और मूर्छा ग्रसती है
और दिनों दिन ज्वर बढता है।