चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 306, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें२८२ चरकसंहिता [ अ० ३ विविद्यादभिचारस्य शापस्य च तदात्मके। यथाक्रमप्रयोगेण लक्षणं स्यात्पृथग्विधम् ॥ १२२ ॥ अन्य अनेक ज्वरों के लक्षण-अभिचार और अभिशाप ज्वर की परीक्षा स्वयं अभिचार के प्रयोग को देखकर, अथवा अभिशाप को सुनकर ( रोगी के मुख से या स्वयं ), अनुमान द्वारा अथवा इनकी चिकित्सा से शमन होने पर करनी चाहिये। अभिचार और अभिशाप के नाना रूप होने से कर्मों के प्रयोग के अनुसार ही इनके लक्षण भी नाना प्रकार के हो जाते हैं ॥ १२१-१२२ ॥ ध्याननिःश्वासबहुलं लिङ्गं कामज्वरे स्मृतम् । शोकजे बाष्पबहुलं त्रासप्रायं भयज्वरे ॥ १२३ ॥ क्रोधजे बहुसंरम्भं भूतावेशे त्वमानुषम् । मूर्च्छामोहमदग्लानिभूयिष्ठं विषसम्भवे ॥ १२४ ॥ केषाञ्चिदेषां लिङ्गानां सन्तापो जायते पुरः । पश्चात्तुल्यं तु केषांचिदेषु कामज्वरादिषु ॥ १२५ ॥ कामादिजानामुद्दिष्टं ज्वराणां यद्विशेषणम् । कामादिजानां रोगाणामन्येषामपि तत्स्मृतम् ॥ १२६ ॥ ते पूर्वं केवलाः पश्चान्निजैर्व्यामिश्रलक्षणाः । हेत्वौषधविशिष्टाश्च भवन्त्यागन्तवो ज्वराः ॥ १२७ ॥ कामजन्य ज्वर में—ध्यान ( एक ही चिन्ता ) निःश्वास का जोर २ से बाहर आना । शोकजन्य ज्वर में—आंखों में आँसू आना, [ और बकना, सु० ] भयजन्य ज्वर में डर लगना ( और बकना, सु० ) होता है । [ चित्त का गिरना आलस्य, अर्धनिद्रा, दिल में दर्द शरीर का दुखना । सु० ] क्रोधजन्य ज्वर में ज्वर की तीव्रता तथा अन्य लक्षण प्रबल रहते हैं, ( रोगी कांपता भी है ) । भूता- विष्ट ज्वर में अमानुषीय ( मनुष्य की शक्ति से बाहर के ) कार्य करता है । विषजन्य ज्वर में मूर्च्छा, मोह, मद और ग्लानि होती है । कामजन्य आदि ज्वरों में कभी कभी सन्ताप इन लक्षणों से पूर्व हो जाता है, कभी पीछे और कभी साथ साथ में होता है । यहां पर कामादि से उत्पन्न ज्वरों के जो विशेष लक्षण कहे हैं, वे लक्षण कामादि से उत्पन्न अन्य रोगों ( उन्माद आदि ) में भी होते हैं । आगन्तुज ज्वर प्रथम स्वतन्त्र रहता है, पीछे से वातादि दोषों के साथ सम्ब- न्धित हो जाता है । इन ज्वरों में कारण तथा चिकित्सा अन्य ज्वरों से भिन्न रहती है ॥ १२३-१२७ ॥