चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयूषैरम्लैरनम्लैर्वा जाङ्गलैर्वा रसैर्हितैः । दशाहं यावदश्नीयाल्लघ्वन्नं ज्वरशान्तये ॥ १६४ ॥ तरुण ज्वर मे ही कषाय का निषेध है । [ सात दिन तक ज्वर तरुण कहाता है, १२ दिन तक मध्यम और इससे आगे पुराना ज्वर कहाता है ] चूंकि कषाय स्तम्भकारक होते है, इसलिये कषाय से दोष जड बन जाते है, पचते नही और विषम ज्वर को उत्पन्न करते है । स्वरस, कल्क, श्रुत, शीत और फाण्ट इस कल्पना का लेकर तरुण ज्वर मे कषाय का निषेध नही है । अपितु जो कषाय कषाय रस वाला है, उसका निषेध तरुण ज्वर मे हे । ज्वर की शान्ति के लिये दसवे दिन अनार, आंवला आदि फलो के रस से खट्टे बनाये या खट्टे किये बिना मूंग आदि का यूष अथवा जांगल पशु-पक्षियो का मास- रस हल्के भोजन के साथ देना चाहिये ॥ १६१–१६४ ॥ अत ऊर्ध्वं कफे मन्दे वातपित्तोत्तरे ज्वरे । परिपक्वेषु दोषेषु सर्पिष्पानं यथाऽमृतम् ॥ १६५ ॥ घृत पान—ज्वर मे जब कफ मन्द हो जाय, वात या पित्त अथवा वात- पित्तप्रधान हो और दोषो का पक्तिपाक हो जाये, उस समय घृत का पान कराना अमृत के समान है ॥ १६५ ॥ निर्दशाहमपि ज्ञात्वा कफोत्तरमलङ्घितम् । न सर्पिः पाययेद्वैद्यः शमनैस्तमुपाचरेत् ॥ १६६ ॥ दस दिन हो जाने पर भी यदि वैद्य को पता लग जाये कि रोगी को लङ्घन नहीं कराया गया तो इसको घृत का पान नही करावे अपितु शमनीय ओषधियो से चिकित्सा करे ॥ १६६ ॥ यावल्लघुत्वादशनं दद्यान्मांसरसेन च । बलं ह्यलं दोषहरं परं तच्च बलप्रदम् ॥ १६७ ॥ जब तक शरीर मे लघुता न आये तब तक मास-रस के साथ लघु आहार देना चाहिये । बल ही दोषो का नष्ट करने मे समर्थ है और मासरस उत्तम बलवर्द्धक है ॥ १६७ ॥ दाहतृष्णापरीतस्य वातपित्तोत्तरं ज्वरम् । बद्धप्रच्युतदोषं वा निरामं पयसा जयेत् ॥ १६८ ॥ दाह और तृष्णा से आक्रान्त, वात-पित्तप्रधान निराम ज्वर मे जब कि दोष रुके हो, परन्तु अपने स्थान से हिल गये हो तो उनको दूध के द्वारा जीतना चाहिये ॥ १६८ ॥