चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१२ चरकसंहिता [ अ० ३ जीवन्ती मधुकं मेदां पिप्पली मरिचं वचाम् ॥ २५० ॥ ऋद्धि रास्ना बलां विश्व शतपुष्पा शतावरीम् । पिष्ट्वा क्षीर जल सर्पिस्तैल च विपचेद्विपक् ॥ २५१ ॥ आनुवासनिकं स्नेहमेतद्विद्याज्ज्वरापहम् । जीवन्त्याद्यनुवासन—जीवन्ती, मुल्हठी, मेदा, पिप्पली, मरिच, वच, ऋद्धि, रास्ना, खरैटी, सोंठ, सौंफ, शतावरी, इनके कल्क के साथ दूध, घी, जल और तैल पकावे । यह अनुवासन वस्ति ज्वर का नष्ट करती है ॥२५१-॥ पटोलपिचुमर्दाभ्या गुडूच्या मधुकेन च ॥ २५२ ॥ मदनैश्च शृतः स्नेहो ज्वरङ्गमनुवासनम् । पटोल पत्र, नीम की छाल, गिलोय, मुल्हटी, मैनफल इनसे साधित स्नेह अनुवासन रूप मे प्रयोग करने से ज्वर को नष्ट करता है ॥ २५२ ॥ चन्दनागुरुकान्मर्यपटोलमधुकोत्पलैः ॥ २५३ ॥ सिद्धः स्नेहो ज्वरहरः स्नेहवरितः प्रयुज्यते । लाल चन्दन, अगर, गम्भारी, परवल, मुल्हठी, नीला कमल, इनसे सिद्ध स्नेह अनुवासन-रूप मे प्रयोग करने से ज्वर को नष्ट करता है ॥ २५३ ॥ यदुक्तं भेषजाध्याये विमाने रोगभेषजे ॥ २५४ ॥ शिरोविरेचनं कुर्याद् युक्तिज्ञस्तज्ज्वरापहम् । यच्च नावनिकं तैलं याश्च प्राग्घूमवर्त्तयः ॥ २५५ ॥ मात्राशितीये निर्दिष्टाः प्रयोज्यास्ता ज्वरेष्वपि । भेषज-चतुष्क अध्यायो मे और विमानस्थान के रोगभेषज प्रकरण मे जो शिरोविरेचन कहे है, उन ज्वरनाशक शिरोविरेचनो का भी युक्ति को समझने वाला वैद्य ही प्रयोग करे । मात्राशितीय अध्याय मे जो नावनिक तैल ( अणु तैल ) और शिरोविरेचन के लिये धूम-वर्त्तिया कही है, उनका भी ज्वर मे प्रयोग करे ॥ २५४-२५५ ॥ अभ्यङ्गाश्च प्रदेहाश्च परिषेकाश्च कारयेत् ॥ २५६ ॥ यथाभिलापं शीतोष्ण विभज्य द्विविधं ज्वरम् । १ कविराज गगाधर सेन मरिच के स्थान पर 'मदन' पढते है । अष्टाग- सग्रह मे भी यही पाठ है । अष्टाग-सग्रह के टीकाकार इन्दु के अनुसार दूध, जल, घी और तिल-तैल चारो समान चाहिये । चक्रपाणि के अनुसार दूध, घी और तेल समान, जल तीन गुना और कल्क चतुर्थाश होना चाहिये । इस प्रकार से जल और दूध स्नेह से चौगुना हो जाते है । तैल और घी बराबर- बराबर या दोष की अपेक्षा से कम अधिक ले सकते है ।