भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 325

अ० ३ ] चिकित्सितस्थानम् ३११

शुद्धे मार्गे हृते दोषे विप्रसन्नेषु धातुषु ॥ २४४ ॥ गताङ्गशूलो लघ्वङ्गः सद्यो भवति विज्वरः । पटोलाद्य बस्ति—परवल, नीम के पत्ते, खस, अमलतास, हीवेर ( नेत्र- वाला ), कुटकी, गोखरू, मैनफल, शालिपर्णी और बला इनको आधे जलमि- श्रित दूध मे डाल कर पकाना चाहिये । जब केवल दूध शेष रह जाये तब इस क्वाथ मे घी और मधु, मैनफल, नागरमोथा, पिप्पली, मुलहठी, इन्द्रजौ इनके कल्क से बस्ति सिद्ध करनी चाहिये । यह ज्वर को नष्ट करती है । मार्ग के शुद्ध होने पर और दोषो के निकल जाने पर, धातुओ के निर्मल होने पर मनुष्य ज्वररहित हो जाता है । अगो की वेदना नष्ट हो जाती है, अग लघु हो जाते है, ज्वर शीघ्र नष्ट होता है । [इस क्वाथ मे दूध के बराबर पानी मिलाना चाहिये। क्वाथ द्रव्यो से आठ गुणा जल उतना ही दूध मिलाना चाहिये।] ॥२४१-२४४॥ आरग्वधमुशीराणि मदनस्य फलानि च ॥ २४५ ॥ चतस्रः पर्णिनीश्चैव निर्यूहमुपकल्पयेत् । प्रियङ्गुर्मदनं मुस्तं अताह्वा मधुयष्टिका ॥ २४६ ॥ कल्कः सर्पिर्गुडः क्षौद्रं ज्वरघ्नो बस्तिरुत्तमः । आरग्वधादि बस्ति—अमलतास, खस, मैनफल, चारो पर्णिया ( माष- पर्णी, मूगपर्णी, शालपर्णी और पृश्निपर्णी ) इनके क्वाथ बनावे । इस क्वाथ मे फूल प्रियगु, मैनफल, नागरमाथा, सौफ, मुलहठी इनका कल्क डाले । घी और गुड तथा शहद मिलावे यह ज्वर नाशक उत्तम बस्ति है ॥ २४५-२४६ ॥ गुडूचीं त्रायमाणा च चन्दनं मधुक वृषम् ॥ २४७ ॥ स्थिरा बला पृश्निपर्णी मदनं चेति साधयेत् । रसं जाङ्गलमांसस्य रसेन सहितं भिषक् ॥ २४८ ॥ पिप्पलीफलमुस्तानां कल्केन मधुकस्य च । ईषत्सलवणं युक्त्या निरूहं मधुसर्पिषा ॥ २४९ ॥ ज्वरप्रशमनं दद्याद्बलस्वेदरुचिप्रदम् । गुडूच्यादि निरूह—गिलोय, त्रायमाणा, लाल चन्दन, मुलहठी, बासे की मूल की छाल, स्थिरा ( शालपर्णी ), खरैंटी, पृश्निपर्णी, मैनफल इनका क्वाथ सिद्ध करे । इस क्वाथ मे जगल मास का रस और पिप्पली, मैनफल, नागर- मोथा, मुलहठी इनका कल्क डाले । इसमे युक्तिपूर्वक थोडा नमक, घी और मधु भी मिलावे । यह बस्ति ज्वरनाशक, बल, स्वेद को बढाने वाला और रुचिकर है । [ अष्टाग-संग्रह के अनुसार गिलोय आदि क्वाथ द्रव्यो के साथ ही मास का पाक करे । पृथक् मासरस सिद्ध नही करे ] ॥ २४७-२४९ ॥