चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ
पृष्ठ 324, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 324
३१० चरकसंहिता [ अ० ३
एरण्डमूलोत्कथितं ज्वरात्सपरिकर्तिकात् ॥ २३५ ॥
पयो विमुच्यते पीत्वा तद्वद्विल्वशलाटुभिः ।
ज्वर में परिकर्तिका साथ हो तो एरण्ड-मूल के क्वाथ से साधित दूध अथवा
बेलगिरी (कच्ची) से साधित दूध पीवे । मल त्याग से पीडा होती हो तो इनका
क्वाथ देवे ॥ २३५-॥
त्रिकण्टकवलाव्याघ्रीगुडनागरसाधितम् ॥ २३६ ॥
वर्चोमूत्रविवन्धघ्नं शोफज्वरहरं पयः ।
त्रिकण्टकाद्य दूध—गोखरू, खरैंटी, छोटी कटेरी, गुड, सोंठ इनसे साधित
गाय का दूध मल मूत्र के अवरोध का, सूजन का ओर ज्वर को नष्ट करता है ॥२३६॥
सनागरं समृद्वीकं सघृतक्षौद्रशर्करम् ॥ २३७ ॥
शृतं पयः सखर्जूरं पिपासाज्वरनाशनम् ।
चतुर्गुणेनाम्भसा वा शृतं ज्वरहरं पयः ॥ २३८ ॥
धारोष्णं वा पयः सद्यो वातपित्तज्वरं जयेत् ।
सोंठ, मुनक्का और खजूर इनके कल्क से यथाविधि साधित दूध में गाय
का घी, शर्करा और मधु (ठण्डा होने पर) मिला कर पीने से प्यास तथा
ज्वर नष्ट होता है । चौगुने जल में सिद्ध किया दूध अथवा धारोष्ण दूध शीघ्र
ही वात-पित्त ज्वर को नष्ट करता है ॥ २३७-२३८ ॥
जीर्णज्वराणां सर्वेषां पयः प्रशमनं परम् ॥ २३६ ॥
पेयं तदुष्णं शीतं वा यथास्वं भेषजैः शृतम् ।
सब प्रकार के पुरातन ज्वरों में दूध का प्रयोग करना उत्तम है। दूध को
गरम या ठण्डा करके और यथादोष ओषधियो से सिद्ध करके देवे ॥ २३६ ॥
प्रयोजयेज्ज्वरहरान्निरूहान् सानुवासनान् ॥ २४० ॥
पक्वाशयगते दोषे वक्ष्यन्ते ये च सिद्धिषु ।
पक्वाशय (बृहदन्त्र) में स्थित दोषों को निकालने के लिये सिद्धिस्थान
में कहे ज्वरनाशक निरूह और अनुवासन बस्तियों का प्रयोग करे ॥ २४० ॥
पटोलारिष्टपत्राणि सोशीरंश्वतुरङ्गुलः ॥ २४१ ॥
ह्रीबेरं रोहिणी तिक्ता श्वदंष्ट्रा मदनानि च ।
स्थिरा बला च तत्सर्वं पयस्यर्धोदके शृतम् ॥ २४२ ॥
क्षीरावशेषं निर्यूहं सयुक्तं मधुसर्पिषा ।
कल्कैर्मदनमुस्तानां पिप्पल्या मधुकस्य च ॥ २४३ ॥
वत्सकस्य च संयुक्तं बस्तिं दद्याज्ज्वरापहम् ।