भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० ४] २२ चिकित्सितस्थानम् ३३७

बहुदोष बलवतो रक्तपित्तं शरीरिणः ॥ ५५ ॥
काले संशोधनार्हस्य तद्धरेन्निरुपद्रवम् ।
विरेचनेनोर्ध्वभागमधोगं वमनेन च ॥ ५६ ॥
त्रिवृतामभयां प्राज्ञः फलान्यारग्वधस्य वा ।
त्रायमाणागवाक्ष्यौर्वा मूलमामलकानि वा ॥ ५७ ॥
विरेचनं प्रयुञ्जीत प्रभूतमधुशर्करम् ।
रसः प्रशस्यते तेषां रक्तपित्ते विशेषतः ॥ ५८ ॥
वमनं मदनोन्मिश्रो मन्थः सक्षौद्रशर्करः ।
सशर्करं वा सलिलमिक्षूणां रस एव वा ॥ ५९ ॥
वत्सकस्य फलं मुस्तं मदनं मधुकं मधु ।
अधोगे रक्तपित्ते तु वमनं परमुच्यते ॥ ६० ॥
ऊर्ध्वगे शुद्धकोष्ठस्य तर्पणादिक्रमो हितः ।
अधोवहे यवाग्वादिर्न चेत्स्यान्मारुतो बली ॥ ६१ ॥
अब बलवान् और बहुदोष वाले रोगियों की चिकित्सा कहते हैं । जिस
रोगी का बल और मांस क्षीण न हुआ हो, बलवान् हो, सन्तर्पण के कारण बहुत
दोष उत्पन्न हुए हों, साथ में कोई उपद्रव न हो तो, रोगी संशोधन के योग्य
हो तो उचित समय में संशोधन देवे । इसके लिये यदि रक्तपित्त ऊर्ध्वगामी हो
तो विरेचन, अधोगामी हो तो वमन देवे ।
विरेचन के लिये—निशोथ और हरड़, या अमलतास के फलों की मज्जा,
या त्रायमाण और इन्द्रायण की जड़, अथवा आँवले का प्रचुर मधु और शर्करा
के साथ देवे । रक्तपित्त में विशेष कर इनको रस के रूप में, क्वाथ के रूप में
भी देना अच्छा है ।
वमन के लिये—मैनफल से युक्त मन्थ में घी और शर्करा मिलाकर, पानी
में शर्करा मिलाकर अथवा गन्ने का रस, अथवा इन्द्रजौ, मोथा, मैनफल, मुल-
हठी और मधु इनको मिलाकर वमन के लिये चटावे । अधोगामी रक्तपित्त में
यह वमन श्रेष्ठ है ।
ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त में विरेचन द्वारा कोष्ठ के शुद्ध होने पर लाजा सक्तु
आदि से तर्पण करना हितकारी है । अधोगामी रक्तपित्त में यदि वायु बलवान्
हो तो यवागू आदि का प्रयोग कर ॥ ५४-६१ ॥
बलमांसपरिक्षीणं शोकभाराध्वकर्शितम् ।
ज्वलनादित्यसंतप्तमन्यैर्वा क्षीणमामयैः ॥ ६२ ॥