चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 382, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३६७ वमनार्हाय वमनं प्रदद्यात्कफगुल्मिने ॥ १३७ ॥ स्निग्धस्विन्नशरीराय ल्मे शैथिल्यमागते । परिवेष्ट्य प्रदीप्तांस्तु बल्वजानथवा कुशान् ॥ १३८ ॥ भिषक्कुम्भे समावाप्य गुल्मं घटमुखे क्षिपेत् । सगृहीतो यदा गुल्मस्तदा घटमथोद्धरेत् ॥ १३६ ॥ वस्त्रान्तरं ततः कृत्वा भिन्द्याद् गुल्मं प्रमाणवित् । विमार्गार्जं यदा पश्येद्यथालाभं प्रपीडयेत् ॥ १४० ॥ मृद्नीयाद् गुल्ममेवैकं न त्वत्र हृदयं स्पृशेत् । कफ-गुल्म की चिकित्सा— ( १ ) कफ-गुल्म का रोगी यदि वमन के योग्य हो तो उसको वमन देवे । स्नेहन और स्वेदन क्रिया से गुल्म को शिथिल बना कर इसको वस्त्र से लपेट देवे । फिर एक घड़े ( घटीयन्त्र) में जलते हुए बल्वज ( तृणविशेष ) और कुशाओं को डाल देवे और घड़े के मुख को गुल्म पर लगा देवे, उससे गुल्म घड़े के मुख की ओर खींचा जाकर पकड़ा जाता है [ वायु के निकल जाने से शून्य स्थान बनने से यन्त्र गुल्म को खींच लेता है, यन्त्र में से वायु निकालने के लिये जलती घास यन्त्र में रक्खी जाती है । आग के बुझने पर परन्तु गरम रहने पर यन्त्र को लगावे ] । जिस समय गुल्म पकड़ा जाये, उस समय घटीयन्त्र को उतार ले । इस गुल्म को वस्त्र से दाबकर प्रमाण का समझने वाला वैद्य चीर देवे, अब विमार्ग, अजपद और आदर्श इनमें से जो भी मिले उस से इसको दबावे जिससे दोष निकल जाय, गुल्म का ही मर्दन पीड़न करे । हृदय पर किसी प्रकार का आघात ( रक्तक्षय से या भय से ) नहीं आने देवे । [ आज कल यह कार्य कपिंग से किया जाता है । घास के स्थान पर स्पिरिट का उपयोग किया जाता है 'विमार्ग' चमारों का यन्त्र है । इसमें वे चमडे को सीधा काटते हैं । इसको राफडी कहते हैं । 'अजपद' बकरी के पैर के समान लकडी का बना यन्त्र होता है । ] ॥ १३७-१४०-॥ तिलैरण्डातसीबीजसर्षपैः परिलिप्य च ॥ १४१ ॥ श्लेष्मगुल्ममयःपात्रैः सुखोष्णैः स्वेदयेद्भिषक् । ( २ ) कफज गुल्म पर तिल, एरण्डबीज, अलसी, सरसो इन का लेप करके सुहाते हुए गरम लोहे के पात्रों से सेक करे ॥ १४१ ॥ सव्योषक्षारलवणं दशमूलीशृतं घृतम् ॥ १४२ ॥ कफगुल्मं जयत्याशु सहिङ्गुबिडदाडिमम् । इति दशमूलीघृतम् ।