चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 381, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३६६ चरकसंहिता [ अ० ५
द्राक्षाभयारस गुल्मे पैत्तिके सगुडं पिवेत् ॥ १३० ॥ लिह्यात्कम्पिल्लकं वाऽपि विरेकार्थं मधुद्रवम् । (७) पित्त-गुल्म मे विरेचन के लिये द्राक्षा और हरड के क्वाथ में गुड मिलाकर अथवा कमीले को मधु मे मिलाकर चाटे ॥ १३० ॥ दाहप्रशमनोऽभ्यङ्गः सर्पिषा पित्तगुल्मिनाम् ॥ १३१ ॥ चन्दनाद्येन तैलेन तैलेन मधुकस्य वा । (८) पित्त-गुल्म म अभ्यंग के लिये घी ( शतधौत या सहस्रधौत ), चन्दनाद्य तैल, या मुल्हठी के क्वाथ ओर कल्क से सिद्ध तैल का उपयोग करे । इससे दाह की शान्त होती है ॥ १३१ ॥ ये च पित्तज्वरार्ताना सतिक्ताः क्षीरवस्तयः ॥ १३२ ॥ हितास्ते पित्तगुल्मिभ्यो वक्ष्यन्ते ये च सिद्धिषु । पित्त-गुल्म मे बस्तिया—पित्तज्वर के रागियों के लिये तिक्त द्रव्यो से सिद्ध दूध की जो बस्तिया कही है, ओर जिन बस्तियों को सिद्धि-स्थान मे आगे कहेंगे उनका पित्त-गुल्म मे प्रयाग करे ॥ १३२ ॥ शालयो जाङ्गल मास गव्याज्ये पयसी घृतम् ॥ १३३ ॥ खर्जूररामलकं द्राक्षा दाडिम सपरूषकम् । आहारार्थे प्रयोक्तव्य पानार्थं सलिलं शृतम् ॥ १३४ ॥ बलाविदारिगन्धाद्यैः पित्तगुल्मचिकित्सितम् । आहार के लिये शालि वान्य, जागल मास, गाय और बकरी के घी और दूध, खजूर, आवला, द्राक्षा, अनारदाना, फालसा, इनको भोजन के लिये दे और पीने के लिये बला और विदारीगन्वादि स्वल्प पञ्चमूल से षडंग पानीय विधि द्वारा साधित जल पीने के लिये देवे, यह पित्तगुल्म की चिकित्सा है ॥ १३३-१३४ ॥ आमान्वये पित्तगुल्मे सामे वा कफवातके ॥ १३५ ॥ यवागूभिः खडैर्यूषैः संधुक्ष्योऽग्निर्बिलङ्घिते । शमप्रकोपौ दोषाणा सर्वेषामग्निसंश्रितौ ॥ १३६ ॥ तस्मादग्नि सदा रक्षेन्निदानानि च वर्जयेत् । पित्तगुल्म मे यदि आम का अनुबन्ध हो, या आमयुक्त कफ अथवा आमयुक्त वायु का ससर्ग हो तो प्रथम लघन कराके यवागुओ द्वारा और खड यूषो से अग्नि का प्रदीपन करे । सब दोषो का शमन और प्रकोप अग्नि के ऊपर ही निर्भर करता है । इसलिये सदा अग्नि की रक्षा करनी चाहिये और निदाना ( कारणों) का परित्याग करना चाहिये ॥ १३५-१३६- ॥