चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 380, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ५ ] चिकित्सास्थानम् ३६५ प्रयोगात्पित्तगुल्मघ्नं सर्वपित्तविकारनुत् । इति द्राक्षाद्यं घृतम् । (४) द्राक्षाद्यघृत—मुनक्का, महुवा, पिण्डखर्जूर, विदारीकन्द, शतावरी, फालसा, त्रिफला, इनको एक-एक पल लेकर २ आढक जल मे क्वाथ करे । (२ प्रस्थ) रहने पर छान ले । इसमे आवले का रस दो प्रस्थ, ईख का रस २ प्रस्थ, दूध २ प्रस्थ, ओर घी २ प्रस्थ मिलावे । कल्कार्थ हरड़ ८ पल ले । इनके द्वारा घृत पकावे । शीतल होने पर इसमे चतुर्थांश शर्करा और मधु (मिलित) मिलाकर प्रयोग करे । यह पित्त गुल्म ओर पैत्तिक रोगो को नष्ट करता है १ ॥ १२३-१२५- ॥ वृषं समूलमापोथ्य पचेदष्टगुणे जले ॥ १२६ ॥ शेषेऽष्टभागे तस्यैव पुष्पकल्कं प्रदापयेत् । तेन सिद्धं घृतं शीतं सक्षौद्रं पित्तगुल्मनुत् ॥ १२७ ॥ रक्तपित्तज्वरश्वासकासहृद्रोगनाशनम् । इति वासाघृतम् । (५) वासाघृत—जड समेत वासा (अडूसा) को लेकर इसको कुचल कर आठ गुणे पानी म क्वाथ करे । जब अष्टमाश रह जाये तब छान कर वासा के फूलो का कल्क मिला कर घी सिद्ध करे । घी के ठण्डा होने पर मधु मिलावे यह घृ पित्त-गुल्म, रक्त पित्त, ज्वर, श्वास, कास और हृदय-रोग का नष्ट करता है। [यह वासा-घृत रक्तपित्त के वासा-घृत से पृथक् है। इसलिये उसे चतुर्गुण पानी मे सिद्ध किया है। अष्टागसग्रहकार दोनो का एक ही माना है ] ॥ १२६-१२७ ॥ द्विपलं त्रायमाणाया जलद्विप्रस्थसाधितम् ॥ १२८ ॥ अष्टभागस्थितं पूतं कोष्ण क्षीरसमं पिबेत् । पिबेदुपरि तस्योष्णं क्षीरमेव यथाबलम् ॥ १२६ ॥ तेन निर्हृतदोषस्य गुल्मः शाम्यति पैत्तिकः । (६) त्रायमाणा का दो पल लेकर ४ प्रस्थ (६४ पल) पानी मे पकावे, अष्टमाश रहने पर इसको छान कर कोसा होने पर इसमे समान मात्रा दूध को मिलावे, इसको पीकर ऊपर से शक्ति-अनुसार गरम दूध पीवे । इससे विरेचन होने पर पैत्तिक गुल्म शान्त हो जाता है । [अष्टागसग्रह मे त्रायमाणा से ही दूध को सिद्ध करके प्रयोग करना लिखा है ] ॥ १२८-१२६- ॥ १. महुवे के स्थान पर मधुक पाठ मे मुलहठी अर्थ होगा ।