चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 379, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ें३६४ चरकसंहिता [अ० ५ शेष रहने पर छान ले । इसको चार पल घी के साथ रोगी को दे । इससे पैत्तिक गुल्म शान्त होता है, और ज्वर, प्यास, शूल, श्रम, मूर्च्छा और अरुचि नष्ट होती है । [आजकल २ पल क्वाथ और २ पल घी वरते ।] ॥११५-११७॥ जले दशगुणे साध्यं त्रायमाणाचतुष्पलम् ॥ ११८॥ पञ्चभागस्थितं पूतं कल्कैः संयोज्य कार्षिकैः । रोहिणी कटुका मुस्ता त्रायमाणा दुरालभा ॥ ११९ ॥ कल्कैस्तामलकीवीराजीवन्तीचन्दनोत्पलैः । रसस्यामलकाना च क्षीरस्य च घृतस्य च ॥ १२०॥ पलानि पृथगष्टाष्टौ दत्त्वा सम्यग्विपाचयेत् । पित्तरक्तभवं गुल्मं विसर्पं पैत्तिक ज्वरम् ॥ १२१ ॥ हृद्रोग कामला कुष्ठ हन्यादेतद् घृतोत्तमम् । इति त्रायमाणाद्य घृतम् । ( २ ) त्रायमाणाद्यघृत—त्रायमाणा ४ पल, पानी दस गुना ( चालीस पल ) लेकर पकाना चाहिये । पञ्चमांश ( ८ पल ) रहने पर छान लेना चाहिये । इसमे कुटकी, मोथा, त्रायमाणा, दुरालभा, तामलकी ( भूई आंवला ), वीरा ( क्षीरकाकोली, शतावरी या शालिपर्णी ), जीवन्ती, चन्दन, नीला कमल प्रत्येक एक एक कर्ष लेकर इनका कल्क, आवले का रस ८ पल, दूध ८ पल, घी ८ पल लेकर सब से घृत सिद्ध करे । यह घृत पित्त-रक्तजन्य गुल्म, वीसर्प, पित्तजन्य ज्वर, हृदय रोग, कामला और कुष्ठ को नष्ट करता है ॥ ११८-१२१ ॥ रसेनामलकेक्षूणां घृतप्रस्थं १ विपाचयेत् ॥ १२२ ॥ पथ्यापादं पिबेत्सर्पिस्तत्सिद्धं पित्तगुल्मनुत् । इत्यामलकाद्यं घृतम् । ( ३ ) आमलकाद्यघृत—आवले का रस या क्वाथ ८ प्रस्थ, गन्ने का रस ८ प्रस्थ, घी २ प्रस्थ, और हरड का कल्क १ शराव ( ८ पल ) लेकर घृत पकाना चाहिये । यह घी पित्त गुल्म को नष्ट करता है ॥ १२२- ॥ द्राक्षा मधूकं खर्जूरं विदारी सशतावरीम् ॥ १२३ ॥ परूषकाणि त्रिफला साधयेत्पलसंमिताम् । जलाढके पादशेष रसमामलकस्य च ॥ १२४ ॥ घृतमिक्षुरसं क्षीरमभयाकल्कपादिकम् । साधयेत्तद् घृत सिद्धं शर्कराक्षौद्रपादिकम् ॥ १२५ ॥ १ 'घृतपादं' इति च पाठः ।