भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 45

३० चरकसंहिता [ अ० २

सुख से हो अर्थात् प्रसव काल में माता को बहुत अस्वाभाविक पीड़ा वा बालक
की मृत्यु आदि न हो, बालक की गर्भ मे स्थिति भी ठीक २ हो ] ॥ ६ ॥
योनिप्रदोषान्ममसोऽभितापाच्छुक्रासृगाहारविहारदोषात् ।
अकालयोगाद्बलसंक्षयाच्च गर्भं चिराद्विन्दति सप्रजाऽपि ॥७॥
योनि के दोष से, मन के संताप से, शुक्र, आर्तव ( रज ) और आहार
विहार के दोष से, ऋतुकाल बीतने पर या निषिद्ध दिनों में पुरुष के साथ
सयोग करने से और दुर्बलता से स्त्री बन्ध्या न होती हुई भी देर मे गर्भ धारण
करती है । [ गर्भ धारण का काल (ऋतुकाल) चरक के मत से १६ रात्रि
और सुश्रुत के मत से १२ रात्रिया हैं ] ॥ ७ ॥
असृङ् निरुद्ध पवनेन नार्या गर्भ व्यवस्यन्त्यबुधाः कदाचित् ।
गर्भस्य रूपं हि करोति तस्यास्तदस्रमस्रावि विवर्धमानम् ॥८॥
मूढ व्यक्ति कभी २ [ सौम्य एव पुष्टिकारक आहार के सेवन करने से ]
वायु के द्वारा रुके हुए स्त्री के आर्तव ( रजो-रुधिर ) को ही 'गर्भ' समझ
लेते हैं, क्योकि वह रुका हुआ रुधिर ही बाहर न आकर गर्भाशय में प्रात
दिन बढता हुआ गर्भ के लक्षण प्रकट करता है ॥ ८ ॥
तदग्निसूर्य श्रमशोकरोगैरुष्णान्नपानैरथवा प्रवृत्तम् ।
दृष्ट्वाऽसृगेवं न च गर्भमज्ञा. केचिन्नरा भूतहृत वदन्ति ॥६॥
ओजोशनानां रजनीचरणामाहारहेतोर्न शरीरमिष्टम् ।
गर्भं हरेयुर्यदि ते न मातुलैब्धावकाशा न हरेयुरोजः ॥ १० ॥
वायु से रुका रक्त अग्नि, सूर्य अथवा थकान आदि से या वायु का अनु-
लोमन करने वाले उष्ण खान-पान मे स्वय प्रवृत्त हा जाता है, तब कई मूढ़
मनुष्य रक्तको ही अकेला देख कर ओर गर्भ को न देख कर इस गर्भ का
'भूत चुरा ले गये' ऐसा कहने लगते हैं। [ जो इस प्रकार कहते हैं, वे मूर्ख हैं।
क्योंकि भूतों द्वारा गर्भ का हरण सम्भव नहीं है ] । जिन का ओज ही भोजन
है, ऐसे रात में विचरने वाले भूतों के आहार के लिये शरीर की आवश्यकता
नहीं है। वे भूत गर्भ का अपहरण कर सकते हैं, यदि उनको अवकाश मिल
जाये, त। वे गर्भ का हरण न करके माता के ओज का ही अपहरण कर सकते हैं १
कन्या सुतं वा सहितौ पृथग्वा सुतौ सुते वा तनयान्यहून्या ।
कस्मात्प्रसूते सुचिरेण गर्भमेकोऽभिवृद्धि च यमेऽभ्युपैति ॥११॥
प्रश्न—( १ ) स्त्री कन्या को क्यों कर उत्पन्न करती है १ अथवा (२) पुत्र
को ही क्योंकर उत्पन्न करती है ? ( ३ ५) दो कन्या वा दो पुत्रों वा कन्या और