भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 485, कुल 616 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 485

अ० १२] चिकित्सितस्थानम् ५०१

अर्शांसि गुल्मं श्वयथुं च कृच्छ्रं निहन्ति वह्निं च करोति दीप्तम्॥५५॥
इति चित्रकादिघृतम् ।
(२०) चित्रकाद्य घृत—यवानिका (अजवायन), चीता, धनिया, पाठा,
दीप्यक (यवानी), सोंठ, मरिच, पिप्पली, अम्लवेतस, बेलगिरी, अनार, यव-
क्षार, पिप्पलीमूल, चव्य प्रत्येक द्रव्य को अक्षमात्र (कर्ष प्रमित) लेकर पीस कर
एक आढक जल मे पकावे। चतुर्थांश क्वाथ रहने पर इसमे एक प्रस्थ घी
मिला कर सिद्ध करे। यह घृत गुल्म, अर्श, कष्टमा य शोथ को भी नष्ट करता
और अग्नि को बढाता है१ ॥ ५४-५५ ॥
पिबेद् घृतं वाऽष्टगुणाम्बुसिद्धं सचित्रकक्षारमुदारवीर्यम् ।
कल्याणकं वाऽपि सपञ्चगव्यं तिक्तं महद्वाऽप्यथ तिक्तकं वा ॥५६॥
इति चित्रकादिघृतम् ।
(२१) शोथ-रोगी को चाहिये कि चित्रक और यवक्षार से आठ गुणे पानी
मे सिद्ध महावीर-घृत को पीवे । वह कल्याणक-घृत या अपस्मारोक्त पञ्चगव्य
घृत, वा कुष्ठ रोग मे कहे तिक्तघृत या महातिक्त घृत का पान करे ॥ ५६ ॥
क्षीरं घटे चित्रककल्कलिप्ते दध्यागतं साधु विमथ्य तेन ।
तज्जं घृतं चित्रकमूलगर्भं तक्रेण सिद्धं श्वयथुघ्नमग्रयम् ॥ ५७ ॥
अर्शांसि शोफानिल२ गुल्ममेहाञ्श्चैतन्निहन्त्यग्निबलप्रदं च ।
तक्रेण वाऽद्यात्सघृतेन तेन भोज्यानि सिद्धामथवा यवागूम् ॥५८॥
इति चित्रकघृतम् ।
(२२)चित्रक-घृत —एक घडे मे चीते की जड की त्वचा को पीस कर लेप करे ।
जब सूख जाये तब इसमे दूध डाल कर दही जमावे। इस दही को मथानी से
मथ कर घृत (मक्खन) को पृथक् कर ले। इस घी को चित्रक-मूल की त्वचा
के कल्क द्वारा घडे के अन्दर की छाल के साथ सिद्ध करे। यह सिद्ध घृत
अर्श, शोथ, अतिसार, वातजन्य गुल्म प्रमेह को नष्ट करता है, अग्नि को बढाता
है। इस तक्र के साथ या इस घी के साथ अन्न खावे अथवा इस तक्र के साथ
सिद्ध यवागू पीवे ॥ ५७-५८ ॥
जीवन्त्यजाजीशटिपुष्कराहैः सकारवीचित्रकबिल्वमध्यैः ।
सयावशूकैर्बदरप्रमाणैर्वृक्षाम्लयुक्ता घृततैलभृष्टाः ॥ ५६ ॥
-----------------------------------------------------------------------------------
१ अष्टाङ्ग-सग्रह मे—दाड़िमयवानीवानकधन्विकापाठाग्लवेतसमरिचपञ्चका-
लबिल्वफलयावशूकानक्षमात्रान् सलिलाढके विपाच्य तत्कषायेण घृतप्रस्थ साधयेत् ।
२ 'अशसि सामानिल' 'अर्शोतिसारानिल' इति च पाठौ ।
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान) · पृष्ठ 485, कुल 616 में से · BharatKosha