भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 486

५०२ चरकसंहिता [ अ० १२ अर्शोऽतिसारानिलगुल्मशोफहृद्रोगमन्दाग्निहिता यवागूः । या पञ्चकोलैर्विधिर्नैव तेन सिद्धा भवेत् सा च समा तयैव ॥ ६० ॥ (२३) जीवन्त्यादि—जीवन्ती, अजाजी (जीरक), कचूर, पोहकरमूल, कारवी ( अजमोदा ), चित्रक, बेलगिरी, यवक्षार प्रत्येक द्रव्य १ बेर भर ( दो शाण ६ मासा ) वृक्षाम्ल ( समगदाना ) दो शाण लेकर इनके क्वाथ मे यवागू सिद्ध करे, इसमे घी ओर तैल का छौंक लगावे । यह यवागू अर्श, अतिसार, वात- गुल्म, शोफ हृदयरोग, मन्दाग्नि को नष्ट करती है । इसी प्रकार से दशमूल की प्रत्येक वस्तु दो शाण लेकर इनके क्वाथ मे सिद्ध यवागू को घी ओर तैल मे भून कर सेवन करने से अर्श, अतिसार आदि मे समान फल होता है१॥ ५६--६०॥ कुलत्थयूषश्च सपिप्पलीको मौद्गश्च सत्र्यूषणयावशूकः । रसस्तथा विष्किरजाङ्गलाना सकूर्मगोधाशिखिशल्लकानाम् ॥ ६१ ॥ ( २४ ) पिप्पली क्वाथ या चूर्ण से साधित कुलथी का यूष, सोठ, मरिच, पिप्पली ओर जौखार से सिद्ध मूग का यूष ( रस ) और विष्किर ( बटेर आदि पक्षी ) तथा जागल ( हरिण आदि ) पशुओ का मास, कछुआ, गोह, मोर, शल्लक ( भूमि मे रहने वाले ) पशुओ का मास रस, सोठ आदि से संस्कृत करके देवे ॥ ६१ ॥ सुवर्चिका गृञ्जनकं पटोलं सवायसीमूलकवेत्रनिम्बम् । शाकार्थिना शाकमतिप्रशस्तं भोज्ये पुराणश्च यवः सशालिः ॥ ६२ ॥ शाक—सुवर्चला ( हुलहुल ), गृञ्जनक ( प्याज या गाजर ), परवल, वायसी ( मकोय ), मूली, बेत और नीम ये शोथरोगिया के लिये उत्तम शाक है । भोजन मे पुराने जौ और चावल उत्तम है ॥६२॥ अभ्यन्तर भेषजमुक्तमेतद् बहिर्हितं यच्छृणु तद्यथावत् । इस प्रकार से ये अन्त औषध कह दिये, अब बाह्य औषधो को भली प्रकार सुना— स्नेहान्प्रदेहान्परिषेचनानि स्वेदांश्च वातप्रबलस्य कुर्यात् ॥ ६३ ॥ ( १ ) यदि वायु की प्रबलता हो तो स्नेहन, प्रदेह, स्वेदन और परिषेचन करे ॥ ६३ ॥ शैलेयकुष्ठागुरुदारुकौन्तीत्वक्पद्मकैलाम्बुपलाशमुस्तैः । प्रियङ्गुथौणेयकहेममांसीतालीशपत्रप्लवपत्रधान्यैः ॥ ६४ ॥ श्रीवेष्टकध्यामकपिप्पलीभिः स्पृक्कानखैश्चैव यथोपलाभम् । १ वृद्ध वाग्भट मे-शठीपुष्करमूलककारवीचित्रकाजाजीजीवन्तीबिल्वमध्यक्षारवृक्षाम्लै- र्दशमूलेन च परीगृहीतानि घृततैलभृष्टानि पेयादीन्यन्यान्यल्पस्नेहलवणान्युपकल्पयेत्॥