भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 487

अ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ५०३ वातान्वितेऽभ्यङ्गमनुषन्ति तैलं सिद्धं सुपिष्टैरपि च प्रदेहम् ॥ ६५ ॥ इति शैलेयादितैलप्रदेहौ । ( २ ) शैलेय आदि तैल और प्रलेप—शैलेय ( शिला रस ), कूट, अगरु, देवदारू, कौन्ती ( रेणुका ), दालचीनी, पद्माख, इलायची, मोथा, बालक, पलाश, प्रियंगु, स्थौणेयक ( ग्रन्थिपर्ण, सुगन्धित द्रव्य ), नागकेसर, जटामांसी, तालीशपत्र, कैवर्त्त मुस्ता, तेजपत्र, धनिया, श्रीवेष्टक ( धूप ), ब्यामक ( गन्ध- तृण ), पिप्पली, स्पृक्का, नख ( व्याघ्रनख ) इन द्रव्यो मे से जो भी मिल जायें उनके क्वाथ और कल्क से ( क्वाथ तेल से चतुर्गुण और कल्क चतुर्थांश ) तैल सिद्ध करे । इस तैल की वातजन्य शोथ मे मालिश करे और इन द्रव्यों को सूक्ष्म पीस कर इनसे प्रलेप करे ॥ ६५ ॥ जलैश्च वासार्ककरञ्जशिग्रुकाश्मर्यपत्रार्जकजैश्च सिद्धैः । स्विन्नः कवोष्णे रवितप्ततोयैः स्नातश्च गन्धैरनुलेपनीयः ॥६६॥ (३) एरण्ड, बासा, अर्क, सहजन, गम्भारी, तेजपात, अर्जक (तुलसी भेद) इनसे तैयार किये कोसे पानी मे अवगाहन करने पर अथवा सूर्य की किरणो से गरम हुए पानी के स्नान करके सास आदि सुगन्धित द्रव्या से लेप करे ॥ ६६ ॥ सवेतसाः क्षीरवता द्रुमाणा त्वचः समाञ्जिष्ठलतामृणालाः । सचन्दनाः पद्मकबालकौ च पैत्ते प्रदेहस्तु सतैलपाकः ॥ ६७ ॥ आक्तस्य तेनाम्बु रवितप्रतं सचन्दनं साभयपद्मकं च । स्नाने हितं क्षीरवता कषायः क्षीरोदकं चन्दनलेपनं च ॥ ६८ ॥ ( ४ ) पैत्तिक शोथ मे—वट, गूलर, पीपल, पारस पीपल, पिलखन इन दूधवाले वृक्षों की छाले, मजीठ, सारिवा, मृणाल ( बिस ), अम्लवेतस ( या जलवेतस ), चन्दन, पद्माख, खस इनके काय और कल्क से सिद्ध तैल की मालिश और इनको बारीक पीस कर इनसे प्रलेप करे । शरीर पर तैल की मालिश करके सूर्य की किरणो से गरम पानी मे स्नान करे । अथवा चन्दन, हरड और पद्माख का क्वाथ हितकारी है, या बड, गूलर, पीपल, पारस पीपल इन दूधिया वृक्षो का कषाय श्रेष्ठ है, या दूब मिला पानी स्नान के लिये उत्तम है। स्नान करने पर चन्दन का लेप करे ॥ ६७-६८ ॥ कफे तु कृष्णासिकतापुराणपिण्याकशिग्रुत्वगुमाप्रलेपः । कुलत्थशुण्ठीजलमूत्रसेकश्चण्डागुरुभ्यामनुलेपनं च ॥ ६६॥ ( ५ ) कफजन्य शोथ मे—पिप्पली, सिकता ( बालू), पुराण पिण्याक ( तिल की पुरानी खली ), सहजन की छाल, अलसी इनका लेप करे । कुलत्थी