भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 488

५०४ चरकसंहिता [ अ० १२ सोंठ इनके क्वाथ से ओर गोमूत्र से स्नान करे । स्नान करने के पीछे चण्डा ( चोरपुष्पी ), अगरु का लेप करे ॥ ६६ ॥ बिभीतकानां गलमध्यलेपः सर्वेषु दाहार्त्तिहरः प्रलेपः । यष्ट्याह्वमुस्तैः सकपित्थपत्रैः सचन्दनैस्तत्पिडकासु लेपः ॥७०॥ रास्नावृषार्कत्रिफलाविडङ्गशिग्रुत्वचो मूषिकपर्णिका च । निम्बार्जकौ व्याघ्रनखाः सदूर्वा सुवर्चला तिक्तकरोहिणी च ॥७१॥ सकाकमाची बृहती सकुष्ठा पुनर्नवा चित्रकनागरे च । उन्मर्दनं शोफिषु मूत्रपिष्ट शस्तस्तथा मूलकतोयसेकः ॥७२॥ ( ६ ) वाताद सब प्रकार के दाहो मे बहेडे के फल की मीगी का लेप करने से दाह मिटता है । शोथजन्य पिड़काओ पर मुलहठी, मोथा, कैथ के पत्ते और चन्दन का लेप करे । ( ७ ) शोफ रोगी को—रास्ना, वासा, आक, त्रिफला, वायविडंग, सहजन की छाल, मूषिकपर्णी ( पूजीपन्ना ), नीम, अर्जक ( तुलसी भेद ), व्याघ्रनखा ( सुगन्धित द्रव्य ), मूर्वा, सुवर्चला ( हुलहुल ), कुटकी, मकोय, बड़ी कटेरी, कूठ, पुनर्नवा, चीता, सोठ इनमे से जो भी मिल सके उनको गोमूत्र मे पीस कर उबटन करे । मूली के जल से सेचन करे ॥ ७०-७२ ॥ शोफास्तु गात्रावयवाश्रिता ये ते स्थानदूष्याकृतिनामभेदात् । अनेकसंख्याः कतिचिच्च तेषां निदर्शनार्थं शृणु चोच्यमानान् ॥७३॥ जो शोफ शरीर के भिन्न २ अवयवों मे उत्पन्न होते है, उनका स्थान, दूष्य, आकृति और नाम भेद से अनेक भेद हो जाते है । उनमें से कुछ एक उदाहरण के लिये कहे जाते है उनका सुनो१ ॥७३॥ दोषास्त्रयः स्वैः कुपिता निदानैः कुर्वन्ति शोफं शिरसः सुघोरम् । अन्तर्गले घुर्घुरिकान्वितं च शालूकमूच्छ्वासनिरोधकारि ॥७४॥ ( १ ) जिस समय वातादि तीनो दोष अपने कारणो से कुपित होकर शिर में भयानक शोथ उत्पन्न करते है ओर गले के अन्दर घुरघर शब्द उत्पन्न कर देते हैं, तब इसका 'शालूक' कहते है, इस शोथ के कारण श्वास मार्ग रुक जाता है२ ॥ ७४ ॥ १ देखिये चरक सूत्रस्थान अ०१८ मे-विशिष्टा नामरूपाभ्या निर्द्देश्याः शोथसग्रहे । २ सुश्रुत मे—कोलास्थिमात्र. कफसम्भवो यो ग्रन्थिर्गले कण्टकशूकभूतः । खर स्थिर शस्त्रनिपातसाध्य. त कण्टशालूकमिति ब्रुवन्ति ॥ कफ-दोष से उत्पन्न जो गाँठ बेर की गुठली के बराबर गले मे कॉटे के