चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
पृष्ठ 489, कुल 616 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १२ ] चिकित्सितस्थानम् ५०५ गलस्य सन्धौ चिबुके गले वा सदाहरागः श्वसनासु चोग्रः । शोफो भृशार्तिस्तु बिडालिका स्याद्धन्याद् गले चेद्गलयीकृता सा ॥७५॥ ( २ ) बिडालिका—गले और मुख की सन्धि मे, गले या चिबुक मे जो दाह और रक्तिमा से युक्त शोथ उत्पन्न होता है, जिससे श्वास-प्रश्वास मे भी कठिनाई और अत्यन्त पीड़ा होती है, उसको 'बिडालिका' कहते है। यदि यह शोथ गले मे कडे के समान सम्पूर्ण गले मे फैल जाय तो रोगी को मार डालती है १ ॥७५॥ जिह्वोपरिष्टादुपजिह्निका स्यात् कफादधस्तादधिजिह्विका च । ( ३ ) तीनो दोषो के कारण तालु मे 'तालु विद्रवि' हो जाती है, इसमे जलन, रक्तिमा और पाक हो जाता है। जिह्वा के ऊपर कफ के कारण 'उप- जिह्निका' हो जाती है, जिह्वा के नीचे 'अविजिह्विका' हो जाती है२ । यो दन्तमासेषु तु रक्तपित्तात् पाको भवेत् सोपकुशः प्रदिष्टः ॥ ७६ ॥ स्याद्दन्तविद्रध्यपि दन्तमासे शोफः कफाच्छोणितसंचयोत्थः । ( ४ ) रक्त पित्त के कारण दांतो के मासो अर्थात् मसूड़ों मे जो पाक हो जाता है उसका नाम 'उपकुश' है। मसूडो मे भी कफ के कारण रक्त का संचय होने से उत्पन्न शोथ ( सूजन ) को दन्तविद्रधि' कहते है ॥ ७६ ॥ गलस्य पार्श्वे गलगण्ड एकः स्याद् गण्डमाला बहुभिस्तु गण्डैः ॥ ७७ ॥ साध्याः स्मृताः पीनसपार्श्वशूलकासज्वरच्छर्दियुतास्त्वसाध्याः । ( ५ ) गले के बाहर की ओर मे एक सूजन हो तो उसे 'गलगण्ड' कहते हैं, यदि एक से अधिक कई सूजन हो तो उसे 'गण्डमाला' कहते है। यदि इस गण्डमाला मे पीनस, पार्श्वशूल, कास, ज्वर, छर्दि ये उपद्रव हो तो असाध्य है, अन्यथा साध्य है३ ॥ ७७ ॥ तेषा सिराकायशिरोविरेका ४ धूमः पुराणस्य घृतस्य पानम् ॥ ७८ ॥ सल्लङ्घनं वक्त्रभवेषु चापि प्रघर्षणं ५ स्यात् कवलग्रहश्च । समान चुभती है, वह कड़ी और स्थिर हा तो शस्त्रद्वारा चीर कर ठीक होती है उसे 'कण्ठ-शालूक' कहते है। १ बलास एवायतमुन्नतं च शोफ करोत्यन्नगति निवार्य । त सर्वथैवाप्रतिवार्यवीर्य विवर्जनीय वलय वदन्ति ॥ सुश्रुत ॥ २ यस्य श्लेष्मा प्रकुपिता जिह्वामूलेऽवतिष्ठते । आशु सजनयेच्छोफ जायतेऽस्योपजिह्विका ॥ ३ गले के अन्दर शोथ होने से गलग्रह होता है । विस्तार के लिये देखिये चरक सूत्रस्थान अ० १८ । ४. 'येषा सिराकायशिरोविरेको' इति वा पाठः । ५. 'प्रहर्षण' इति च ।