भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

पृष्ठ 511, कुल 616 में से

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अ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५२७ पिप्पली नागरं दन्ती चित्रक द्विगुणाभयम् । विडङ्गांशयुतं चूर्णमेतदुष्णाम्बुना पिबेत् ॥ ७९ ॥ ( १ ) पिप्पली, सोठ, दन्ती, चीता और बायविडंग प्रत्येक द्रव्य एक-एक भाग और हरड दो भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को गरम पानी से पीवे ॥ ७९ ॥ विडङ्गं चित्रकं शुण्ठीं सघृतां सैन्धवं वचाम् । दग्ध्वा कपाले पयसा गुल्मप्लीहापहं पिबेत् १ ॥ ८० ॥ ( २ ) बायविडग, चीता, सोठ, सैन्धा नमक और वच इनको शरावे मे जला कर भस्म कर ले । इस भस्म को घी मे मिलाकर दूध के साथ पीने से गुल्म और प्लीहा रोग नष्ट होते है ॥८०॥ रोहीतकलतानां तु काण्डकानभयाजले २ । मूत्रे वा सुनुयात्तच्च ३ सप्तरात्रस्थित पिबेत् ॥ ८१ ॥ कामलागुल्ममेहार्शः प्लीहसर्वोदरक्रिमीन् । तद्धन्त्याज्जाङ्गलैरसैर्जीर्णे स्याच्चात्र भोजनम् ॥ ८२ ॥ ( ३ ) रोहीतक ( रोहेडा ) के टुकडो को कूट कर तथा हरडों को गोमूत्र मे या जल मे भिगो कर रख दे । सात दिन के पीछे इस पानी को छान कर पीने से कामला, गुल्म, प्रमेह, अर्श, प्लीहा सब प्रकार के उदर रोग और कृमि नष्ट होते है । आषव के जीर्ण होने पर जागल मासरस के साथ भोजन खाना चाहिये ॥ ८१-८२ ॥ रोहीतकत्वचः कृत्वा पलानां पञ्चविंशतिम् । कोलद्विप्रस्थसंयुक्तं कषायमुपकल्पयेत् ॥ ८३ ॥ पालिकैः पञ्चकोलैस्तु तैः सर्वैश्चापि तुल्यया । रोहीतकत्वचा पिष्टैर्घृतप्रस्थं विपाचयेत् ॥ ८४ ॥ प्लीहाभिवृद्धि शमयत्येतदाशु प्रयोजितम् । तथा गुल्मोदरश्वासक्रिमिपाण्डुत्वकामलाः ॥ ८५ ॥ ( ४ ) रोहीतक घृत—रोहेडे की छाल २५ पल, कोल ( बेर ) दो प्रस्थ लेकर आठ गुणे पानी मे क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थांश रहने पर छान ले । इसमे पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य चित्रक और सोठ प्रत्येक एक-एक पल और रोहेडे की छाल का चूर्ण ५ पल लेकर इस कल्क द्वारा घृत का एक प्रस्थ सिद्ध , १. 'भवेत्' इति पाठान्तरम् । २. 'काण्डका• साभया जले' इति । ३. 'मूत्रे वा श्रुतमेतच्च' इति च पाठः ।

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