भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 556

५७२ चरकसंहिता [ अ० १४ शोफ और अरुचि को नष्ट करता है, बल, वर्ण और अग्नि को बढाता है, कामला, श्वित्र, कृमिरोग, ग्रन्थिरोग, अर्बुद, व्यंग और राजयक्ष्मा ज्वर को नष्ट करता है, यह अरिष्ट सिद्ध फलप्रद है ॥१३६-१४४॥ दन्तीचित्रकमूलानामुभयोः पञ्चमूलयोः । भागान् पलांशानापोथ्य जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ १४५ ॥ त्रिफलाया दलानां च प्रक्षिप्य त्रिपलं ततः । रसे चतुर्थशेषे तु पूते शीते समावपेत् ॥ १४६ ॥ तुला गुडस्य तत्तिष्ठन्मासार्थं घृतभाजने । तन्मात्रया पिबेन्नित्यमर्शोभ्योऽपि प्रमुच्यते ॥ १४७॥ ग्रहणीपाण्डुरोगघ्न वातवर्चोनुलोमनम् । दीपनं चारुचिन्नं च दन्त्यरिष्टमिमं विदुः ॥ १४८ ॥ इति दन्त्यरिष्टः । (३७) दन्त्यरिष्ट—दन्तीमूल, चित्रकमूल, दोनों पञ्चमूल (दशमूल) और गुठलीरहित हरड़, आवला और बहेड़ा प्रत्येक एक-एक पल लेकर एक द्रोण पानी मे क्वाथ करना चाहिये । जब चतुर्थांश रह जाये तब इस को छान कर ठण्डा होने पर गुड़ के १०० पल मिला कर घी से भावित घडे मे १५ दिना तक रखना चाहिये । इस अरिष्ट को मात्रानुसार पीने से अर्श-रोग से मुक्ति हो जाती है१ । यह अरिष्ट ग्रहणी, पाण्डु रोग नाशक, वायु ओर मल का अनुलोमक, अग्निदीपक, भोजन मे रुचि उत्पन्न करता है ॥१४५-१४८॥ हरीतकीफलप्रस्थं प्रस्थमामलकस्य च । विशालाया दधित्यस्य पाठाचित्रकमूलयोः ॥ १४६ ॥ द्वे द्वे पले समापोथ्य द्विद्रोणे साधयेदपाम् । पादावशेषे पूते च रसे तस्मिन् प्रदापयेत् ॥ १५० ॥ गुडस्यैका तुला वैद्यस्तत्स्थाप्यं घृतभाजने । पक्षस्थितं पिबेदेनं ग्रहण्यर्शोविकारवान् ॥ १५१ ॥ हृत्पाण्डुरोग प्लीहानं कामला विषमज्वरम् । है। यथा—पिप्पलीमरिचविडङ्गैलावाळुकलोध्राणा द्वे पले । इन्द्रवारुण्याः पञ्च पलानि ॥ सुश्रुत० चि० ७ ॥ १ वृद्धवाग्भट मे पाठ इस प्रकार से है—'दन्ती चित्रकत्रिफलादश- मूलानि पलिकानि उदकद्रोणे साधयेत् ।' जल्पकल्पतरु में त्रिफला मे प्रत्येक द्रव्य तीन पल लेना लिखा है ।