भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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अ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५७१

( ३४ ) अंकुर यदि कठोर तथा सूजे हुए हो तो पिप्पल्यादि अनुवासन द्रव्यों को पीसकर घी आदि मिलाकर थोड़ा सा गरम करके कड़छी ( चम्मच ) द्वारा अंकुरो पर लेप करना चाहिये । इस प्रकार लेप करने से रक्तयुक्त कफ मिश्रित पिच्छा ( स्राव ) अंकुरो से निकल आती है । इससे कण्डु ( खाज ), कठोरता, वेदना और सूजन शान्त हो जाती है ॥ १३६-१३७ ॥ निरूहं वा प्रयुञ्जीत सक्षीरं दाशमूलिकम् । समृत्रस्नेहलवणं कल्कैर्युक्तं फलादिभिः ॥ १३८ ॥ ( ३५ ) दशमूल के क्वाथ में दूध, गोमूत्र, घृतादि स्नेह, नमक, मेनफल आदि का कल्क मिलाकर इनसे सिद्ध निरूह का प्रयोग करना चाहिये ॥१३८॥ हरीतकीनां प्रस्थार्धं प्रस्थमामलकस्य च । स्यात्कपित्थाद्दशपलं ततोऽर्धा चेन्द्रवारुणी ॥ १३६ ॥ विडङ्गं पिप्पली लोध्रं मरिचं सेलवालुकम् । द्विपलांशं जलस्यैतच्चतुर्द्रोणे विपाचयेत् ॥ १४० ॥ द्रोणशेषे रसे तस्मिन्पूते शीते समावपेत् । गुडस्य द्विशतं तिष्ठेत्तत्पक्षं घृतभाजने ॥ १४१ ॥ पक्षादूर्ध्वं भवेत्पेया ततो मात्रा यथाबलम् । अस्याभ्यासादरिष्टस्य नश्यन्ति गुदजा द्रुतम् ॥ १४२ ॥ ग्रहणीपाण्डुहृद्रोगप्लीहगुल्मोदरापहः । कुष्ठशोफारुचिहरो बलवर्णाग्निवर्धनः ॥ १४३ ॥ सिद्धोऽयमभयारिष्टः कामलाश्वित्रनाशनः । कृमिग्रन्थ्यर्बुदव्यङ्गराजयक्ष्मज्वरान्तकृत् ॥ १४४ ॥ इत्यभयारिष्टः । ( ३६ ) अभयारिष्ट—हरड ( बिना गुठलियो के ) ८ पल, बिना गुठली का आवला ८ पल, कैथ का गूदा १० पल, इन्द्रवारुणी ( भसडूम्बा ) ५ पल, वायविडग, पिप्पली, लोध, मरिच, ऐलावालुक प्रत्येक द्रव्य दो पल इन सब द्रव्यों का चार द्रोण पानी में क्वाथ करना चाहिये । जब एक द्रोण रह जाये तो छान लेना चाहिये । ठण्डा होने पर इसमे गुड़ २०० पल मिला कर घी से भावित घड़े मे १५ दिन तक रख देना चाहिये । पन्द्रह दिन के पीछे अग्नि के बलानुसार इसको पीना चाहिये । इसके निरन्तर सेवन से अर्श रोग नष्ट होता है १ । यह अरिष्ट ग्रहणी, पाण्डुरोग, हृदयरोग, प्लीहा, गुल्म, उदररोग, कुष्ठ, १ जल्पकल्पतरु में 'पलादर्धेनेन्द्रवारुणी' इस पाठ से आधा पल इन्द्र- वारुणी लिया है । परन्तु सुश्रुत के पाठ से असगत होने के कारण विचारणीय