भारतकोश
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

महर्षि चरक व दृढ़बल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

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पृष्ठ 554

५७० चरकसंहिता [ अ० १४ (३२) वैद्य को चाहिये कि वायु और मल का अनुलोमन करने के लिये शर्करा से उत्पन्न मदिरा, मीधु, तक्र, तुषोदक, अरष्टि, दधि मस्तु, पका कर ठण्डा किया जल, कण्टकारी (छोटी कटेरी) का पका कषाय, सोंठ और धनिया का पका कषाय अनुपान रूप मे देवे ॥ १२८-१३० ॥ उदावर्तपरीता ये ये चात्यर्थं विरूक्षिताः । विलोमवाताः शूलार्तास्तेष्विष्टमनुवासनम् ॥ १३१ ॥ (३३) जो अर्श रोगी उदावर्त्त रोग से पीड़ित हो, जो अत्यन्त रूक्ष हो, जिनका वायु विलोम हो, शूल से पीड़ित हो उन रोगियों को अनुवासन देना चाहिये ॥ १३१ ॥ पिप्पली मदनं बिल्वं शताह्वा मधुकं वचाम् । कुष्ठं शटी पुष्कराख्यं चित्रकं देवदारु च ॥ १३२ ॥ पिष्ट्वा तैल विपक्तव्य पयसा द्विगुणेन च । अर्शसा मूढवाताना तच्छ्रेष्ठमनुवासनम् ॥ १३३ ॥ गुदनिःसरणं शूलं मूत्रकृच्छ्रं प्रवाहिकाम् । कट्यूरुपृष्ठदौर्बल्यमानाहं वंक्षणाश्रयम् ॥ १३४ ॥ पिच्छास्राव गुदे शोफ वातवर्चोविनिग्रहम् । उत्थान बहुशो यच्च जयेत्तच्चानुवासनात् ॥ १३५ ॥ अनुवासन द्रव्य—पिप्पली, मैनफल, बेलगिरी, सौंफ, मुलहठी, वच, कूठ, कचूर, पोहकर मूल, चित्रक, देवदारु प्रत्येक समान भाग लेकर कल्क रूप मे पीस लेना चाहिये । यह कल्क २० तोला, दूध २ सेर, तैल १ सेर लेकर तैल सिद्ध करना चाहिये । यह तैल मूढ-वात (जिनमे वायु न ऊपर जाये न नीचे जाती हो) रोगिया के लिये उत्तम अनुवासन है। गुदा का बाहर निकलना, शूल, मूत्रकृच्छ्र, प्रवाहिका, कटि, पीठ, जाघो की निर्बलता, काखो का फूलना, पिच्छा स्राव, गुदा की सूजन, वायु और मल का अवरोध, बार-बार थोड़ा- थोड़ा मल आता हो तो वह भी इससे शान्त होता है ॥ १३२-१३५ ॥ आनुवासनिकैः पिष्टैः सुखोष्णैः स्नेहसंयुतैः । दर्व्या तैरौषधैर्देह्याः स्तब्धाः शूना गुदेरुहाः१ ॥ १३६ ॥ दिग्धास्तैः प्रस्रवन्त्याशु श्लेष्मपिच्छां सशोणिताम्२ । कण्डूः स्तम्भः सरुक् शोफः स्रुतानां विनिवर्तते ॥ १३७ ॥ १. 'दार्वन्तै स्तब्धशूलानि गुदजानि प्रलेपयेत्' इति च । २ श्लेष्मपिच्छासशोणिताः इति च पाठः ।